उपराष्ट्रपति ने किया वैज्ञानिकों के जन्म शताब्दी समारोह का उद्घाटन

नई दिल्ली, 23 दिसंबर (इंडिया साइंस वायर): उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू ने क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान संचार को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया है, जिससे वैज्ञानिक
अवधारणाओं एवं उनके विकास को आम आदमी की मातृभाषा में उन तक पहुँचाया जा सके, जिससे उनमें आवश्यक वैज्ञानिक मनोवृत्ति पैदा की जा सके।

उन्होंने उल्लेख किया कि संविधान लोगों में ‘वैज्ञानिक सोच और जिज्ञासा की भावना’ को एक मौलिक कर्तव्य के रूप में सूचीबद्ध करता है, और कहा कि पुस्तकों, टेलीविजन कार्यक्रमों और रेडियो प्रसारण के माध्यम से विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के प्रयासों को बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों के जीवन पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक के प्रभाव पर विचार करने का आह्वान किया और कहा कि विज्ञान पर अब अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक विमर्श होना चाहिए।

वैज्ञानिक समुदाय को सुझाव देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनके पास कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के समान वैज्ञानिक सामाजिक जिम्मेदारी (एसएसआर) है, जिसका अनुकरण करते हुए वैज्ञानिकों को उनके क्षेत्रों में हुई प्रगति को लोगों तक ले जाने के प्रयास करने चाहिए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, विज्ञान प्रसार द्वारा आयोजित छह प्रेरक
भारतीय वैज्ञानिकों के एक साल तक चलने वाले जन्म शताब्दी समारोह का उद्घाटन करते हुए
उपराष्ट्रपति ने ये बातें कही हैं।

महान भारतीय गणितज्ञ, श्रीनिवास रामानुजन के जन्मदिन के अवसर पर मनाये जाने वाले राष्ट्रीय गणित दिवस, 22 दिसंबर के मौके पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। रामानुजन के योगदान को याद करते हुए श्री नायडू ने राष्ट्र निर्माण में भारतीय वैज्ञानिकों और गणितज्ञों के योगदान को मान्यता देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “हमें अपने युवाओं को ऐसे वैज्ञानिकों की प्रेरक कहानियां सुनानी चाहिए और उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।”

श्री नायडू ने उन छह वैज्ञानिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनकी जन्मशती विज्ञान प्रसार मना रहा है। इन वैज्ञानिकों में, हर गोबिंद खुराना, जी.एन. रामचंद्रन, येलावर्ती नायुदम्मा, बालासुब्रमण्यम राममूर्ति, जी.एस. लड्डा और राजेश्वरी चटर्जी शामिल हैं। इन सभी का जन्म वर्ष 1922 में हुआ था। उन्होंने कहा कि उन्हें औपनिवेशिक शासन के दौरान अपने वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता, सम्मान और संसाधन नहीं मिलने के बावजूद इन वैज्ञानिकों ने अपने वैज्ञानिक प्रयास में अदम्य भावना दिखाई है।

विज्ञान प्रसार ने इस वर्ष भारतीय स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ऐसे 75 दिग्गज भारतीय वैज्ञानिकों की सूची तैयार की है, जिनके योगदान एवं कार्यों से आम लोगों को परिचित
कराया जाएगा। उपराष्ट्रपति ने भारत को वैज्ञानिक अनुसंधान में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने से संबंधित प्रयासों को तेज करने का आह्वान किया है। इसके लिए, उन्होंने अनुसंधान एवं विकास में सार्वजनिक और निजी निवेश बढ़ाने, शोधार्थियों को प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित करने,

पेटेंट व्यवस्था में बाधाओं को हल करने और व्यापक अनुप्रयोगों को खोजने वाले प्रभावी विचारों को पोषित करने पर बल दिया है। साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनीयरिंग और मैथेमेटिक्स (स्टेम) के क्षेत्र में श्री नायडू ने लैंगिक विषमता के मुद्दे को दूर करने की बात भी कही है। उन्होंने कहा कि भले ही स्टेम क्षेत्र में 42 प्रतिशत से अधिक महिला स्नातक हैं, लेकिन अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में संलग्न महिलाओं की भागीदारी केवल 16.6 प्रतिशत है। उन्होंने एक अनुकूल वातावरण बनाने का आह्वान किया है,

ताकि अधिक से अधिक महिलाएं गणित और विज्ञान में अपना करियर बना सकें। बच्चों में भय पैदा करने वाले गणित और विज्ञान जैसे विषयों का उल्लेख करत हुए श्री नायडू ने सुझाव दिया कि अनुभवात्मक शिक्षण विधियों के माध्यम से इन विषयों में रुचि जगायी जा सकती है। “पहेलियों, प्रदर्शनों और अन्य व्यावहारिक गतिविधियों का उपयोग बच्चों को संख्याओं के साथ दोस्ती कराने में मददगार हो सकता है।” भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के. विजय राघवन,

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ. श्रीवरी चंद्रशेखर और विज्ञान प्रसार के निदेशक डॉ. नकुल पाराशर ने युवाओं और बच्चों को उन सभी वैज्ञानिकों और टेक्नोक्रेट्स के जीवन और कार्य से अवगत कराने की आवश्यकता पर बल दिया है, जिन्होंने भारतीय विज्ञान के निर्माण में अपना
योगदान दिया है। कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित एक विशेष सत्र में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने उन छह वैज्ञानिकों के जीवन और कार्यों को याद किया, जिनकी जन्मशती इस वर्ष मनायी जा रही है।

प्रोफेसर सी. मोहन राव ने बताया कि कैसे प्रोफेसर हर गोबिंद खुराना ने आनुवंशिक कोड को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और कैसे वह 20वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों में से
एक बन गए। प्रोफेसर रोहिणी गोडबोले ने बताया कि एक उत्कृष्ट अकादमिक और वैज्ञानिक होने के अलावा, प्रोफेसर राजेश्वरी चटर्जी ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए इंडियन एसोसिएशन फॉर विमेन स्टडीज के साथ सामाजिक कार्यक्रमों पर काम किया।

प्रोफेसर एम.एम.शर्मा ने देश में कई रासायनिक उद्योगों की स्थापना में प्रोफेसर जी.एस. लड्डा के योगदान को याद किया। डॉ. एस. रामासामी ने डॉ. येलावर्ती नायुदम्मा की सामाजिक समावेशीकरण की प्रतिबद्धता और वंचितों की भलाई के लिए अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ तालमेल स्थापित के लिए किए गए उनके प्रयासों को याद किया। प्रोफेसर पी. बलराम ने कोलेजन की ट्रिपल हेलिकल

संरचना में प्रोफेसर जी.एन.रामचंद्रन के योगदान को याद किया और कहा कि पश्चिमी देशों में
अनुसंधान कार्यों के कई प्रस्तावों के बावजूद उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना।
वहीं, प्रोफेसर सुधा शेषायन ने देश में मस्तिष्क अनुसंधान के समन्वय के लिए एक शीर्ष निकाय
के रूप में हरियाण के मानेसर में राष्ट्रीय मस्तिष्क केंद्र की स्थापना में प्रोफेसर बी. राममूर्ति के
योगदान के बारे में विस्तार से बताया।

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