बॉयोमास से ईंधन उत्पादन अध्ययन के लिए एआई टूल का उपयोग

नवनीत कुमार गुप्ता

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दिनोंदिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इसी दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास के शोधकर्ताओं द्वारा बॉयोमास को गैसीय ईंधन में बदलने में शामिल प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का उपयोग किया जा रहा है। व्यावहारिक प्रयोगों के माध्यम से ऐसी समझ हासिल करना समय लेने वाली और महंगी होती है। कंप्यूटर सिमुलेशन और मॉडलिंग अध्ययन त्वरित अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं जिनका उपयोग बॉयोमास प्रसंस्करण के लिए प्रक्रियाओं के लिए किया जा सकता है।

पेट्रोलियम से निकाले जाने वाले ईंधन से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताओं के साथ, बॉयोमास एक व्यावहारिक समाधान है। इसीलिए दुनिया भर के शोधकर्ता लकड़ी, घास और यहां तक ​​कि अपशिष्ट कार्बनिक पदार्थ जैसे बॉयोमास से ईंधन निकालने के तरीके खोज रहे हैं।

ऐसा बॉयोमास से निर्मित किए जाने वाले ईंधन भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि भारत में बॉयोमास की वर्तमान उपलब्धता लगभग 750 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है और उनसे ईंधन निकालने से देश को ईंधन आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में काफी मदद मिल सकती है।

इस शोध का नेतृत्व डॉ. हिमांशु गोयल, सहायक प्रोफेसर, केमिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास और डॉ. निकेत एस कैसरे, प्रोफेसर, केमिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास ने किया था।

इस शोध संबंधी मॉडलिंग अध्ययन के हाल के परिणाम प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री जर्नल रिएक्शन केमिस्ट्री एंड इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुए थे। पेपर के सह-लेखक डॉ. हिमांशु गोयल, डॉ. निकेत कैसरे और श्री कृष्ण गोपाल शर्मा है।

इस तरह के अध्ययनों के महत्व के बारे में बताते हुए, डॉ हिमांशु गोयल, सहायक प्रोफेसर, केमिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास ने कहा कि “कच्चे बॉयोमास को ईंधन में बदलने में शामिल जटिल तंत्र को समझना और संबंधित प्रक्रियाओं को डिजाइन करने और रिएक्टरों को अनुकूलित करने के लिए यह प्रयास महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा, डॉ हिमांशु गोयल ने कहा, “अगली पीढ़ी के इंजीनियरों को उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग और मशीन लर्निंग के कौशल पर प्रशिक्षित करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे हमारे सामने कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों, जैसे कि शून्य-उत्सर्जन प्रौद्योगिकियों का विकास करना आदि का समाधान कर सकें। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए इस तरह के प्रयास महत्वपूर्ण साबित होंगे।

बॉयोमास को ईंधन और रसायनों में बदलने को समझने के लिए दुनिया भर में मॉडल विकसित किए जा रहे हैं, अधिकांश मॉडलों को चालू होने में लंबा समय लगता है। मशीन लर्निंग (एमएल) जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल मॉडलिंग प्रक्रियाओं को तेज कर सकते हैं।

आईआईटी मद्रास की शोध टीम ने लिग्नोसेल्यूलोसिक बॉयोमास के ऊर्जा सघन सिनगैस (बायोमास का गैसीकरण) में रूपांतरण के दौरान होने वाली प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए रिकरंट न्यूरल नेटवर्क्स (आरएनएन) नामक एक एमएल पद्धति का उपयोग किया है।

डॉ. निकेत एस कैसरे, प्रोफेसर, केमिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास ने इस बारे में बताया कि, “हमारे शोध की नवीनता यह है कि यह बॉयोमास में खर्च किए गए उत्पादित जैव ईंधन की संरचना की भविष्यवाणी करने में सक्षम है। हमने सटीक डेटा जनरेशन के लिए एक सांख्यिकीय रिएक्टर का उपयोग किया, जो मॉडल को परिचालन स्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला पर लागू करने की अनुमति देता है। ”

डॉ. हिमांशु गोयल का अनुसंधान समूह न केवल बायोमास-जैव ईंधन रूपांतरण अध्ययन के लिए बल्कि सामाजिक रूप से प्रासंगिक और पर्यावरणीय रूप से लाभकारी प्रक्रियाओं जैसे कार्बन कैप्चर और रासायनिक उद्योग के विद्युतीकरण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का उपयोग करता है।

टीम का मानना ​​​​है कि गहन तकनीकी समाधानों के तेजी से विकास और तैनाती के लिए कम्प्यूटेशनल विधियों में तेजी से प्रगति को कोर इंजीनियरिंग के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। यह अनुसंधान राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (एनएसएम) द्वारा वित्त पोषित किया जाता है। मिशन को विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डीईआईटीवाई), भारत सरकार द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वित और संचालित किया जा रहा है।  

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