आजादी के बाद से अब तक देश को स्वावलंब बनाने में डीआरडीओ की भूमिका

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (Defence Research & Development Organization) की स्थापना सन 1958 में दिल्ली में हुई थी। इसका गठन प्रौद्योगिकी विकास अधिष्ठान (Technology Development Establishment) , प्रौद्योगिकी विकास (technology development) और उत्पादन निदेशालय (Directorate of Production) तथा भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) के अधीन किया गया था।

यह भारत सरकार के रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के अंतर्गत कार्यरत हैं। सन 1960 में डीआरडीओ ने अपनी पहली परियोजना को अंजाम दिया था जिसका नाम इंडिगो रखा गया था।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन वर्तमान में 52 प्रयोगशालाओं का एक समूह है जो रक्षा प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों जैसे- वैमानिकी, शस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, लड़ाकू वाहन, इंजीनियरिंग प्रणालियाँ, इंस्ट्रूमेंटेशन, मिसाइलें, उन्नत कंप्यूटिंग और सिमुलेशन, विशेष सामग्री, नौसेना प्रणाली, लाईफ साइंस, प्रशिक्षण, सूचना प्रणाली तथा कृषि में कार्य कर रहा है। डीआरडीओ लगातार विश्व एवं देश की सुरक्षा हेतु उन्नत हथियारों एवं मिसाइलों का निर्माण कर रहा है। वर्तमान में डॉ. जी. सतीश रेड्डी (Dr. G. Satheesh Reddy) इसके चेयरमैन हैं।

डीआरडीओ का लक्ष्य

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (Defence Research & Development Organization) का सर्वप्रथम लक्ष्य रक्षा सेवाओं की आवश्यकता हेतु विश्व स्तर पर मौजूद प्रतिस्पर्धियों से जंग के दौरान इस्तेमाल होने वाले हथियार तथा उत्पाद (weapons and products) के निर्माण में देश को आत्मनिर्भर बनाना है।

साथ ही देश की सुरक्षा सेवाओं के लिये स्टेट-ऑफ-द-आर्ट सेंसर (state-of-the-art sensors), शस्त्र प्रणाली (weapon systems), प्लेटफॉर्म और संबद्ध उपकरणों का उत्पादन, डिज़ाइनिंग, विकास और नेतृत्व प्रदान करना है। देश के सैनिकों को स्वयं की सुरक्षा तथा देश की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित कार्यक्रमों का संचालन भी डीआरडीओ द्वारा एक लक्ष्य के अंतर्गत आता है। 

इसके अलावा सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर (military infrastructure) को मजबूती प्रदान करना, भारतीय सैनिकों को तकनीकी रक्षा सेवा (Technical Defense Service) से संबंधित उचित तकनीकी समाधान से अवगत कराना, सेंसर प्रणाली (sensor system) को उत्तम बनाना तथा उन्नत एवं गुण आधारित श्रम शक्ति (Advanced and quality based labor force) का निर्माण करना डीआरडीओ का लक्ष्य रहा है। वहीं युद्ध की प्रभावशीलता का अनुकूलन और सैनिकों के हित को बढ़ावा देने संबंधी सेवाओं का प्रोद्यौगिकीय समाधान प्रदान करना भी डीआरडीओ का लक्ष्य है।

एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम

भारत ने प्रतिरक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए 1983 में एक महत्वकांक्षी परियोजना ‘एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम’ की आधारशिला रखी। इसकी स्थापना का विचार प्रसिद्ध विज्ञानी डा. एपीजे अब्दुल कलाम के दिमाग की उपज था। इसका उद्देश्य मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भरता बनाना था।

रक्षा बलों द्वारा विभिन्न प्रकार की मिसाइलों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस कार्यक्रम के तहत पाँच मिसाइल प्रणालियों को विकसित करने की आवश्यकता को मान्यता दी गई। आइजीएमडीपी को औपचारिक रूप से 26 जुलाई, 1983 को भारत सरकार की मंजूरी मिली। जिसके बाद भारत ने स्वदेशी पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, आकाश और नाग मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।

अग्नि और पृथ्वी सीरीज की मिसाइलों का उत्पादन हो या फिर हल्के लड़ाकू विमान तेजस , मल्टी बैरल राकेट लांचर पिनाका, वायु रक्षा प्रणाली आकाश, रडार और इलेक्ट्रानिक युद्ध प्रणालियों की एक विस्तृत सीरीज विकसित करने में सर्वप्रमुख भूमिका इसी की रही है। ब्रह्मोस मिसाइल को इसने रूस के साथ मिलकर तैयार किया, जो रडार को चकमा दे सकने वाला सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। डीआरडीओ ने हाल के वर्षों में अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं।

इनमें आइएनएस विक्रमादित्य पर लाइट कांबैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) की लैंडिंग, हाइपरसोनिक टेक्नोलाजी डेमांस्ट्रेशन व्हीकल (एचएसटीडीवी) का परीक्षण, लेजर गाइडेड एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) आदि शामिल हैं।

अब तक डीआरडीओ द्वारा जिन मिसाइलों का निर्माण किया गया है उन मे से कुछ इस प्रकार हैं-:

1. अग्नि मिसाइल : यह परमाणु सक्षम और सतह से सतह पर 5,000 किलोमीटर रेंज तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है। दुश्मन के किसी भी शहर को यह देखते ही देखते नेस्तनाबूद कर सकती है। इसका वजन करीब 50 हजार किलोग्राम है। मिसाइल 1.75 मीटर लंबी है। इसका व्यास 2 मीटर है। यह अपने साथ 1.5 टन वॉरहेड ले जाने में समर्थ है। इसका मतलब हुआ कि यह मिसाइल 1500 किलोग्राम तक के परमाणु हथियार अपने साथ ले जा सकती है।

2. पृथ्वी मिसाइल : यह मिसाइल पांच सौ से 1000 किलोग्राम तक वजनी अस्त्र ले जाने में सक्षम है। सतह से सतह पर 350 किलोमीटर की दूरी तक मारने वाली पृथ्वी मिसाइल में तरल ईंधन वाले दो इंजन लगाए गए हैं। इसे तरल और ठोस दोनों तरह के ईंधन से संचालित किया जा सकता है। यह 8.56 मीटर लंबी,1.1 मीटर चौड़ी और 4,600 किलोग्राम वजन वाली हैं। यह मिसाइल 483 सेकेंड तक और 43.5 किमी की ऊंचाई तक उड़ान भर सकती है।

3. आकाश मिसाइल : यह सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। यह 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लक्ष्य पर हमला कर सकती है और 2.5 मैक तक की गति से उड़ान भर सकती है। यह मिसाइल ध्वनि की गति से 2.5 गुना तीव्र गति से लक्ष्य को भेद सकती है तथा निम्न, मध्यम और उच्च ऊँचाई पर लक्ष्यों का पता लगाकर उन्हें नष्ट कर सकती है। यह कम वज़न वाली दागो और भूल जाओ (Fire and Forget) प्रणाली पर काम करने वाली मिसाइल है।

4. त्रिशूल मिसाइल : करीब तीन मीटर लंबी और 200 सेंटीमीटर व्यास वाली यह मिसाइल, सुपरसोनिक गति से उड़ने और अपने साथ 15 कि.ग्रा. आयुध ले जाने में सक्षम है। इस मिसाइल का इस्तेमाल सेना के तीनों अंगों द्वारा किया जा सकता है और यह वायुयानों और हेलिकॉप्टरों जैसे लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

5. नाग मिसाइल : इस मिसाइल की अचूक मारक क्षमता जमीन से 4 किमी है जबकि हैलीकॉप्टर से इसकी मारक क्षमता 5 किमी है। यह मिसाइल काफी हल्की है और इसे लाने-ले जाने में सुविधा रहेगी। यह दुश्मन के टैंक को एक बार में ही तहस-नहस कर सकती है।

6. सागरिका मिसाइल : भारत के पास सागरिका नाम की ऐसी मिसाइल भी है जो समुद्र में से दागी जा सकती है और जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। सबमरीन लाँच्ड बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) सागरिका को 2008 में विशाखापत्तनम के तटीय क्षेत्र से छोड़ा गया था। यह मिसाइल 700 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती है। इस तरह की मिसाइलें चंद ही देशों के पास हैं।

7. निर्भय मिसाइल : निर्भय सभी मौसम में काम करने वाली, कम लागत, लंबी दूरी की परंपरागत और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम क्रूज मिसाइल है। मिसाइल 6 मीटर लंबी है व वज़न लगभग 1500 किलो है। इसकी सीमा 1000 किलोमीटर से अधिक है। मिसाइल को टेक ऑफ के लिए ठोस रॉकेट बूस्टर द्वारा संचालित किया जाता है। यह मिसाइल विभिन्न ऊंचाई 500 मीटर से लेकर 4 किमी की ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम है। 

8. शौर्य मिसाइल : जमीन से जमीन पर मार करने वाली यह बैलेस्टिक मिसाइल परमाणु क्षमता से लैस है। यह मिसाइल 800 किलोमीटर दूर तक टारगेट को तबाह कर सकती है। यह मिसाइल मौजूदा मिसाइल सिस्टम को मजबूत करेगी और संचालन में हल्की व आसान है। यह कम ऊंचाई पर भी छह मैक के वेग तक पहुँच सकती हैं। 

9. ब्रह्मोस मिसाइल : भारत ने इसका निर्माण रूस के सहयोग से किया। दोनों देशों के बीच 1998 में ये ज्वाइंट वेंचर हुआ था। इस मिसाइल का भारत कई बार परीक्षण कर चुका है। ब्रहमोस 290 किलोमीटर तक की मार करने की क्षमता रखता है और इसका वजन तीन टन है। ये जहाज, पनडुब्बी और हवा समेत कई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है। ये मिसाइल ध्वनि की गति से 2.8 गुना ज्यादा गति से उड़ान भर सकती है।

10. अस्त्र मिसाइल : यह हवा से हवा में मार करने वाला भारत द्वारा विकसित पहला मिसाइल है। यह उन्नत मिसाइल लड़ाकू विमान चालको को 80 किलोमीटर की दूरी से दुश्मन के विमानों पर निशाना लगाने और मार गिराने की क्षमता देता है। इस मिसाइल की खासियत इसकी तेजी है। यह 4.5 मैक यानी 5556.2 किलोमीटर की गति से हमला करता है। यानी एक सेकेंड में 1.54 किलोमीटर की स्पीड।

11. धनुष मिसाइल : धनुष मिसाइल को नौसेना के इस्तेमाल के लिए विकसित किया गया है और यह 350 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित लक्ष्य को भेद सकती है। ये पृथ्वी मिसाइल का नौसनिक संस्करण है इसकी लंबाई दस मीटर और चौड़ाई एक मीटर है और यह भी 500 किलोग्राम तक के हथियार ढो सकती है। इसे डीआरडीओ ने विकसित किया है और निर्माण भारत डाइनेमिक्स लिमिटिड ने किया है।

12. युद्ध टैंक अर्जुन : इस टैंक की सबसे बड़ी खासियत है कि ये टैंक पूरी तरह से देश में ही डिजाइन, विकसित और निर्मित किया गया है। इसे डीआरडीओ और सीवीआरडीई ने 15 अलग एकेडमिक संस्थान, 8 लैब और कई सारे सूक्ष्म और लघु उद्योगों के साथ मिलकर तैयार किया है। इस मे 7.62 एमएम की मशीन गन और 12.7 एमएम की मशीनगन भी लगाई गई है जो एंटी एयरक्राफ्ट और जमीन पर लक्ष्य भेदने में माहिर है। अपनी मारक और बचाव क्षमता के चलते यह विश्वस्तरीय टैंक की श्रेणी में शामिल है।

13. तेजस लड़ाकू विमान : तेजस विमान एक सुपर सोनिक फाइटर जेट है, जो एक बार में 23 हजार किलोमीटर की दूरी तय करता है। तेजस की खासियत है कि इसमें हवा में ईंधन भरा जा सकता है। तेजस की स्पीड 2222 किमी प्रति घंटा है और यह अपने साथ 13500 किलोग्राम वजन ले जा सकता है। तेजस 43.5 फीट लंबा और 14.9 फीट ऊंचा है। यह हल्का और आकार में भी छोटा है। तेजस पर हवा से हवा में, हवा से धरती और हवा से पानी पर हमला करने वाले हथियार लोड किए जा सकते हैं। 

14. लेज़र चेतावनी प्रणाली : एक लेजर चेतावनी रिसीवर एक प्रकार की चेतावनी प्रणाली है जिसका उपयोग निष्क्रिय सैन्य रक्षा के रूप में किया जाता है। 

15. प्रहार मिसाइल : प्रहार जमीन से जमीन तक मार करने वाली मिसाइल है जिसका जुलाई 2011 में परीक्षण किया गया। इसकी मारक क्षमता 150 किलोमीटर है। ये कई तरह के warhead ले जाने की क्षमता रखता है। इसकी लंबाई 7.3 मीटर, वजन 1280 किलोग्राम और डायामीटर 420 मिलीमीटर है। 200 किलोग्राम का पेलोड ले जाने की क्षमता रखने वाली इस मिसाइल का रिएक्शन टाइम काफी कम है यानी प्रतिक्रिया काफी जल्दी होती है। इसे डीआरडीओ ने दो साल से भी कम समय में विकसित किया है।

कोरोना वायरस (Corona Virus) के दौरान भी इस महामारी से लड़ने में डीआरडीओ का सक्रिय और सराहनीय योगदान रहा है। इसने पीपीई किट, सैनिटाइजर्स, मास्क, यूवी सिस्टम, वेंटिलेटर के महत्वपूर्ण भाग आदि उपलब्ध कराए। जिससे देश बहुत कम समय में पर्याप्त मात्रा में वेंटिलेटर निर्माण में सक्षम हो सका और सैकड़ो लोगो की जान बच सकी। इतना ही नहीं डीआरडीओ द्वारा ही कोरोना मरीजों के लिए ‘2-डीआक्सी-डी-ग्लूकोज’(2-deoxy-D-glucose) नामक औषधि को विकसित किया गया था।

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