वैज्ञानिकों ने विकसित किया बड़े पैमाने का रिएक्टर, पर्याप्त मात्रा में करेगा हाइड्रोजन का उत्पादन

नई दिल्ली, 30 सितंबर (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय): वैज्ञानिकों की एक टीम ने पहली बार एक बड़े पैमाने का रिएक्टर विकसित किया है जो सूर्य के प्रकाश और पानी जैसे स्थायी स्रोतों का उपयोग करके पर्याप्त मात्रा में हाइड्रोजन का उत्पादन करता है, यह एक किफायती और लंबे समय तक कायम रह सकने वाली प्रक्रिया है। भारत ने 2030 तक 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य रखा है।

इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए, वर्तमान परिदृश्य में, दुनिया भर के शोधकर्ता ऐसे अक्षय ऊर्जा समाधानों की दिशा में काम कर रहे हैं जो सीमित कार्बन उत्सर्जन के साथ लंबे समय तक जारी रखे जा सकें। इसे प्राप्त करने के सबसे किफायती तरीकों में से एक प्रकाश उत्प्रेरक जल विखंडन के माध्यम से बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन का उत्पादन करना है।

यह कम लागत वाली प्रक्रिया होने के साथ बढ़ती हुई अक्षय ऊर्जा जरूरतों के लिए दीर्घकालिक स्थायी समाधान है जो लंबे समय तक समाज को लाभान्वित करेगा। इसलिये इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में वैज्ञानिकों के बड़े प्रयास अत्यंत आवश्यक और इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता हैं।

इस दिशा में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के एक स्वायत्त संस्थान नैनो विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) मोहाली के डॉ. कमलकन्नन कालीसम और उनकी टीम ने प्राकृतिक रुप से प्राप्त सूर्य के प्रकाश के द्वारा चलित एक प्रोटोटाइप रिएक्टर विकसित किया है जो बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन का उत्पादन करता है। उन्होंने इसके लिए पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कार्बन नाइट्राइड नामक रसायन का उपयोग उत्प्रेरक के रूप में किया है।

कई शोधकर्ताओं द्वारा जटिल धातु ऑक्साइड/नाइट्राइड/सल्फाइड आधारित हेट्रोजीनियस सिस्टम का उपयोग करके कई बार इस प्रक्रिया के लिये प्रयास किये गये थे, लेकिन इसका बड़ी मात्रा में फिर से उत्पादन किया जाना बहुत मुश्किल था। आईएनएसटी टीम ने कार्बन नाइट्राइड्स में कम लागत वाले ऑर्गेनिक सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल किया, जिसे इसके सस्ते पूर्ववर्ती जैसे यूरिया और मेलामाइन का उपयोग करके बड़े पैमाने पर आसानी से तैयार किया जा सकता है।

जब इस अर्धचालक पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन और छिद्र उत्पन्न होते हैं। इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन को कम कर हाइड्रोजन का उत्पादन करते हैं, वहीं रासायनिक एजेंटों जिन्हें सेक्रेफिशल एजेंट कहते हैं, के द्वारा छिद्रों को भरा जाता है। अगर छिद्रों को भरा नहीं जाये तो, वे इलेक्ट्रॉनों के साथ पुनर्संयोजन करेंगे। यह काम डीएसटी नैनो मिशन एनएटीडीपी परियोजना द्वारा समर्थित है, और संबंधित लेख हाल ही में ‘जर्नल ऑफ क्लीनर प्रोडक्शन’ में प्रकाशित हुआ है, और टीम प्रौद्योगिकी के लिए पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया में है।

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