मानसिक रोगों के उपचार में योग की भूमिका

नवनीत कुमार गुप्ता:-सदियों से जिस योग को भारतीय मनीषियों ने मानवता के लिए लाभकारी बताया था। वर्तमान
में विज्ञान द्वारा योग के लाभों पर शोध कार्यों से इसकी सत्यता साबित हो रही है। यही कारण है कि योग के महत्व को ध्यान में रखते हुए पूरा विश्व 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रहा है।
हाल ही में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के ‘योग एवं ध्यान का विज्ञान और प्रौद्योगिकी (सत्यम)’ कार्यक्रम के तहत संपन्न एक शोध में यह पता चला है कि योग, मानक विषाद रोधी उपचार बड़े विषाद संबंधी विकार (एमडीडी) वाले रोगियों को नैदानिक और जैविक दोनों ही प्रकार से राहत प्रदान कर सकता है और इससे पहले ही राहत मिल सकती है।
यह शोध ‘द कनाडियन जर्नल ऑफ साइकियेटरी’ में प्रकाशित हुआ है। बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाईंसेज (निमहन्स) के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. मुरलीधरण केसवन के नेतृत्व में किए गए अनुसंधान ने बड़े विषाद संबंधी विकार (एमडीडी) में रोग के उपचारात्मक प्रभावों के साथ साथ संबंधित न्यूरोबायोलॉजिकल आधार पर योग के प्रभावों का आकलन किया है।
निमहन्स में पहले किए गए अध्ययनों ने एमडीडी लक्षणों एवं उनसे संबंधित तनाव हारमोन स्तरों को घटाने तथा ब्रेन में गामा अमीनोबुटरिक एसिड (गाबा) नामक अवरोधक न्यूरोट्रांसमीटर के स्तरों एवं ब्रेन के स्वायत्त कामकाज में सुधार लाने में आशाजनक परिणाम प्रदर्शित किए हैं।

इस अनुसंधान में, शोध समूह ने विषाद के नैदानिक लक्षणों एवं संबंधित विभिन्न बायोमार्कर्स के आकलन के जरिये इसके कार्य के तंत्र पर योग उपचार की प्रभावशीलता का आकलन किया है। उन्होंने 3.5 वर्षों में 70 व्यक्तियों पर गाबा कार्यकलाप (ट्रांसक्रैनियल मैग्नेटिक स्टीमुलेशन- टीएमएस), ब्लड बायोमार्कर्स (इंटरल्यूकिन स्स्टिम के रास्ते प्रतिरक्षण प्रणाली असामान्यताओं), इमोशनल प्रोसेसिंग एवं ब्रेन एक्टिविटी-फंक्शनल मैग्नेटिक रिजोनेंस इमेजिंग (एफएमआरआई) ऑटोमैटिक फंक्शनिंग-हार्ट रेट परिवर्तनशीलता (एचआरवी) जैसे बायोमार्कर्स का आकलन किया।
उन्होंने यह भी पाया कि योग जल्द आरंभ कर देने से अच्छा परिणाम और रोग का बेहतर निदान हो सकता है तथा यह हल्के से मध्यम विषाद में मोनोथेरेपी के रूप में भी योग प्रभावी भूमिका दिखाता है। विषाद के रोगियों में सुधार को बढ़ाने में योग की प्रशसनीय उपचारात्मक भूमिका के कारण, निमहन्स में दी जा रही आईपी एवं ओपी सेवाओं में विषाद वाले रोगियों के लिए नैदानिक अभ्यास में रूटीन अनुशंसा के लिए इस पर विचार किया जा रहा है।

इस शोध समूह में बेंगलूरु के नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाईंसेज (निमहन्स) के डॉ. गंगाधर बी.एन., डॉ. वेंकटसुब्रमनियन जी, डॉ. रोज डॉन भरथ, डॉ. सत्यप्रभा टी. एन., डॉ. किवराज उड्डुपु , डॉ. मरियम्मा फिलिप, डॉ. मोनोजीत तथा पुणे के आदित्य बिरला अस्पताल के कंसलटैंट मनोचिकित्सक डॉ. स्नेहा जे. करमाणी भी शामिल हैं।

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