अंटार्टिक संधि की 30वीं वर्षगांठ पर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, बोले – भारत कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए प्रतिबद्ध

नई दिल्ली, 5 अक्टूबर (विज्ञान एवम प्रौद्योगिकी मंत्रालय): केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज अंटार्टिक संधि के पर्यावरणगत सुरक्षा पर मैड्रिड प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर की वर्षगांठ मनाने के लिए आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया। इस सम्मेलन में वर्चुअल रूप से मेजबान देश स्पेन के प्रधानमंत्री श्री पेड्रो सांचेज,

न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री श्री जैकिंडा आर्डर्न, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री श्री स्कॉट मोरिसन, प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने वाले विभिन्न देशों के मंत्रियों तथा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अंटार्टिक वातावरण में कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा, भारत ने पहले ही पवन ऊर्जा उत्पादन की व्यवहार्यता के साथ प्रयोग करके हरित ऊर्जा पहल को अपनाया है और प्रायोगिक आधार पर पवन ऊर्जा जेनेरेटर (डब्ल्यूईजी) के मध्यम उत्पादन को संस्थापित किया है। उन्होंने कहा कि अंटार्टिक में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए भारती स्टेशन के लिए कंबाइंड हीट एवं पावर (सीएचपी) का चयन भी पर्यावरण की सुरक्षा के भारत के संकल्प को बढ़ावा देता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत पर्यावरण सुरक्षा समिति (सीईपी) के विकासशील जलवायु प्रत्युत्तर कार्यक्रम में भी योगदान देने के लिए उत्सुक है। उन्होंने कहा कि ध्रुवीय महासागरों द्वारा जलवायु प्रेरित कार्बन डायऑक्साइड (सीओ 2) के तेज होने से अम्लीकरण पैदा होता है जो समुद्री वातावरण और इकोसिस्टम को नष्ट कर देता है,

जिससे धीरे धीरे मत्स्य पालन प्रभावित होता है और अंत में यह विनाशकारी बायोम शिफ्ट को प्रोत्साहित करता है जो अगले 30 वर्षों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। मंत्री ने दुहराया कि भारत को भी संभावित मुद्वों के रूप में पर्यटन विकास और अवैध बिना सूचित और अविनियमित (आईयूयू) फिशिंग का अनुमान है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत अंटार्टिक पर्यावरण और उस पर निर्भर तथा जुड़े इकोसिस्टम की व्यापक सुरक्षा तथा अंटार्टिक को शांति एवं विज्ञान के लिए समर्पित प्राकृतिक रिजर्व के रूप में नामित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत भी अंटार्टिक संधि के पर्यावरणगत सुरक्षा पर प्रोटोकॉल के प्रति अपनी प्रतिबद्धता फिर से दुहराता है और यह भारतीय अंटार्टिक कार्यक्रम में एटीसीएम में अपनाए गए सभी निर्णयों,

संकल्पों तथा उपायों को प्रभावशाली तरीके से कार्यान्वित करेगा। यह भारत के दोनों अंटार्टिक अनुसंधान केंद्रों -मैत्री तथा भारती में सौर पैनल तथा पवन ऊर्जा जेनरेटरों जैसी हरित वैकल्पिक ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करेगा, जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लाएगा तथा केंद्र को वैकल्पिक हरित ऊर्जा के द्वारा दक्ष बनाएगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आगे कहा कि, “हमने मैड्रिड प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर एवं कार्यान्वयन को अपनाने के 30 वर्ष पूरे कर लिए हैं जो अंटार्टिक के पर्यावरणगत तथा इस पर निर्भर इकोप्रणालियों को संरक्षित करने की हमारी प्रतिबद्धता दुहराता है।” उन्होंने कहा कि मैड्रिड प्रोटोकॉल के प्रति 42 देशों द्वारा मैड्रिड प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर एवं कार्यान्वयन अंटार्टिक के पर्यावरण की ठोस संरक्षा से जुड़ी एक उल्लेखनीय उपलब्धि है

और भारत ने 1998 में इस ‘प्रोटोकॉल’ पर हस्ताक्षर करने पर खुद को गौरवान्वित महसूस किया।
जितेंद्र सिंह ने इस सफल बैठक और सम्मेलन का आयोजन करने तथा अंटार्टिक के पर्यावरण की सुरक्षा करने की दिशा में हमारी प्रतिबद्धता को चिन्हित करने के लिए अवसर उपलब्ध कराने के लिए स्पेन को बधाई दी।

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