कुंभ मेले से जुड़ी हैं कई मर्यादाएं, आइये जाने

दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला इस बार उत्ताराखण्ड स्थित हरिद्वार में लगने जा रहा हैं. कुंभ के आयोजन को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं और 27 फरवरी से लगने जा रहे कुंभ मेले को लेकर चर्चा भी जोरों पर हैं.

कोरोना महामारी के  धार्मिक नगरी हरिद्वार में लगने जा रहा कुंभ मेला उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के लिए एक चुनौती भी हैं. बात अगर कुंभ मेले की करे तो इसकी अनेक मर्यादाएं हैं तो वहीं तो अनेक बंधन, मिथक और नियम भी उनके साथ जुड़े हैं. इसके साथ ही कुछ परंपराएं भी साथ चलती हैं.

इसमें पहला हैं कि पहला शाही स्नान जुलूस गंगा पार के कुंभ मेला क्षेत्र से नहीं गुजरता, लेकिन अपर रोड होते हुए हरकी पैड़ी पहुंचता है. आपको बता दे कि संन्यासियों की वापसी भी नगर के भीतरी मार्गों से होती है.

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कुंभ में शाही स्नानों की संख्या 4 होती हैं जो इस बार भी हरिद्वार कुंभ में होगी. आपको बता दे कि इस बार महाशिवरात्रि पर 11 मार्च को होने वाला पहला शाही स्नान संन्यासियों के सात अखाड़े पूर्ण गणवेश में शाही जुलूस निकालकर करेंगे.

इसके अलावा पहला शाही स्नान करने के लिए बैरागियों के तीन और उदासियों के दो अखाड़े नहीं आते. वहीं इसी प्रकार निर्मल अखाड़े के साधु भी पहला स्नान नहीं करते. हालांकि सांकेतिक रूप से पिछले हरिद्वार कुंभ में बाकी अखाड़ों के पांच-पांच महंत संन्यासियों के साथ गए थे. लेकिन स्नान प्रोटोकॉल में यह शामिल नहीं है,  इसलिए इस बार इसे नहीं दोहराया जाएगा. आपको बता दे कि जिस प्रकार तीनों बैरागी अणियां पहला शाही स्नान नहीं करती, उसी प्रकार कोई भी अन्य अखाड़ा 27 अप्रैल को होने वाला अंतिम शाही स्नान करने हरकी पैड़ी नहीं जाता.

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 गौरतलब है कि कुंभ का मेला इस बार हरिद्वार में लगने जा रहा हैं जिसको लेकर देश – सहित विदेशों में भी उत्साह देखने को मिल रहा है. उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार जमकर हरिद्वार कुंभ की तैयारियों में लगी हुई हैं.

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