भारत के इस मंदिर में नही जा सकते आदमी… जानिए क्या है वजह

देश दुनिया में ऐसे कई मंदिर हैं जहां स्त्रियों के जाने पर रोक है। मगर क्या आप जानते हैं किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहां औरत नहीं बल्कि पुरुषों का जाना वर्जित हो। आपको जानकार हैरानी होगी कि भारत में ऐसा कोई एक मंदिर नही बल्कि बहुत से मंदिर है जहां आदमियों के जाने पर प्रतिबंध है। ऐसे ही कुछ मंदिरो के बारे में आज हम आपको बताएंगे जहां पुरुष कदम भी नही रख सकते और मंदिर के अंदर प्रवेश करने से पहले उन्हे सोलह श्रृंगार करना पड़ता है। तो चलिए जानते हैं भारत के उन मंदिरो के बारे में जहां प्रवेश करने से पहले पुरुषो का जाना निषेध माना जाता है।

ब्रह्म देव का मंदिर (पुष्कर, राजस्थान)
पूरे हिंदुस्तान में ब्रह्मा का एक ही मंदिर है और वो है पुष्कर में। ये मंदिर ऐतिहासिक मान्यता रखता है और यहां कोई भी ऐसा पुरुष जिसकी शादी हो गई हो वो नहीं आ सकता। मान्यता है कि वैवाहिक जीवन शुरू कर चुके पुरुष अगर यहां आएंगे तो उनके जीवन में दुख आ जाएगा। पुरुष मंदिर के आंगन तक जाते हैं, लेकिन अंदर पूजा सिर्फ महिलाएं करती हैं।

कथा के अनुसार ब्रह्मा को पुष्कर में एक यज्ञ करना था और माता सरस्वती उस यज्ञ के लिए देरी से आईं। इसलिए ब्रह्मा ने देवी गायत्री से शादी कर यज्ञ पूरा कर लिया। इसके बाद देवी सरस्वती रूठ गईं और श्राप दिया कि कोई भी शादीशुदा पुरुष ब्रह्मा के मंदिर में नहीं जाएगा।

कोट्टनकुलंगरा/ भगवती देवी मंदिर (कन्याकुमारी, तमिलनाडु)

प्रचलित लोक मान्यता के अनुसार भगवती देवी का ये मंदिर जिसे कोट्टनकुलंगरा भी कहा जाता है, कन्याकुमारी में स्थित है। जहां भगवती देवी की आराधना होता है, धार्मिक शास्त्र में इन्हें देवी दुर्गा का ही स्वरूप माना गया है। यहां के परंपरा की मानें तो इस मंदिर में किसी भी पुरुष के आने पर रोक है। जी हां, यहां यानि इस मंदिर परिसर में पूजा करने के लिए केवल स्त्रियां ही आती हैं। स्त्रियों के अलावा इस मंदिर प्रांगण में पूजा आदि के लिए किन्नरों को भी आजादी प्राप्त है। इस मंदिर से संबंधित सबसे खास बात तो ये है कि यहां अगर पुरुषों को मंदिर में प्रवेश करना हो तो उन्हें महिलाओं की तरह सोलह श्रृंगार करना पड़ता है। 

मंदिर से जुड़ी अन्य मान्यता के मुताबिक प्राचीन समय में देवी मां यहां तपस्या करने आईं थीं ताकि उन्हें भगवान शिव पति के रूप में मिल सकें। तो वहीं दूसरी मान्यता की मानें तो जब भगवाव शिव देवी सती माता को लेकर भ्रमण कर रहे थे तो देवी सती रीढ़ की हड्डी इसी स्थान पर गिरी था। जिसके उपलक्ष्य में यहां मंदिर का निर्माण किया गया। इसके अतिरिक्ति ये भी कहा जाता है कि ये मंदिर सन्यास का भी प्रतीक है, जिस कारण सन्यासी पुरुषों को मंदिर के गेट तक जाने की अनुमति है।  

कामरूप कामाख्या मंदिर (गुवाहाटी, असम)

असम का कामाख्या मंदिर, मान्‍यता है कि ये वो मंदिर है। जहां देवी की पीरियड के समय पूजा की जाती है। महिलाएं यहां पीरियड्स के समय भी आ सकती हैं। यहां पुजारी भी महिलाएं ही हैं। माता सती का मासिक धर्म वाला कपड़ा बहुत पवित्र माना जाता है। ये मंदिर 108 शक्ति पीठों में से एक है।

मान्यता है कि जब सती माता ने अपने पिता के हवन कुंड में कूदकर जान दी थी तब शिव इतने क्रोधित हो गए थे कि वो सती का शरीर लेकर तांडव करने लगे। विष्णु भगवान से सृष्टि को बचाने के लिए सति के शरीर को सुदर्शन चक्र से काट दिया था। सति के 108 टुकड़े हुए थे जो पृथ्वी पर जहां भी गिरे वहां शक्ति पीठ बन गई। कामाख्या में माता सती का गर्भ और उनकी योनि‍ गिरी थी। इसीलिए मूर्ति भी योनि‍ रूपी है और मंदिर में एक गर्भ ग्रह भी हैं। इस मंदिर की देवी को साल में तीन दिन महावारी होती है।

चक्कुलाथुकावु मंदिर (नीरात्तुपुरम, केरल)
यहां हर साल पोंगल के अवसर पर नवंबर/दिसंबर में नारी पूजा होती है। इस पूजा में पुरुष पुजारी महिलाओं के पैर धोते हैं। उस दिन को धानु कहा जाता है। इस दिन पुजारी पुरुष भी मंदिर के अंदर नहीं जा सकते। पोंगल के समय 15 दिन पहले से ही यहां महिलाओं का हुजूम दिखने लगता है। महिलाएं अपने साथ चावल, गुड़ और नारियल लेकर आती हैं ताकि पोंगल बनाया जा सके और प्रसाद के तौर पर दिया जा सके। ये मंदिर मां दुर्गा को समर्पित है।
इस मंदिर को महिलाओं का सबरीमला भी कहा जाता है। हिंदू पुराण देवी महात्मयम में इस मंदिर के बारे में बताया गया है। देवी को शुंभ और निशुंभ नाम के दो राक्षसों को मारने के लिए सभी देवताओं ने याद किया था क्योंकि वो किसी पुरुष के हाथों नहीं मर सकते थे। देवी ने यहां आकर दोनों का वध किया था।

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