जानिए क्यों मनाई जाती गणेश चतुर्थी, तारीख, महत्व और इसका इतिहास

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार चतुर्थी भगवान गणेश की तिथि है। शुक्ल पक्ष के दौरान अमावस्या या अमावस्या के बाद की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में जानी जाती है और कृष्ण पक्ष के दौरान पूर्णिमा या पूर्णिमा के बाद पड़ने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता माना जाता है तथा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का अवतरण हुआ था।

इसलिए भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है।

पूरे भारत में गणेश चतुर्थी से लेकर अगले दस दिनों तक जमकर उत्साह देखा जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी सेलिब्रेशन 10 सितंबर को किया जाएगा। 11 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का समापन 21 सितंबर को होगा। गणेश शंकर और पार्वती के बेटे हैं। जिन्हें 108 नामों से जाना जाता है। सभी देवताओं में सबसे पहले गणेश की ही पूजा की जाती है। 

चलिए जानते हैं आखिर क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी…

शिवपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने अपने मैल से एक पुतला बनाकर उसे जीवित किया था। जिसके बाद उन्होंने उससे कहा कि वे स्नान करने जा रही हैं, इस दौरान महल में किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दें। संयोगवश उसी वक्त भगवान शिव का आना हुआ। उन्हें अंदर जाता देख गणेश जी ने बाहर ही रोक दिया। शिवजी ने बालक गणेश को बहुत समझाया लेकिन वे नहीं माने। इस पर क्रोध में आकर भगवान शिव ने बाल गणेश का सिर त्रिशूल से काट दिया। स्नान से लौटने के बाद जब देवी पार्वती को इस बात का पता चला तो वह बेहद नाराज हो गईं।

उनकी नाराजगी को दूर करने के लिए भोलेनाथ ने गणेश जी के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा दिया। ऐसी मान्यता है कि लंबोदर का जन्म भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुआ था। इसीलिए यह दिन हर साल गणेश जी के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है। गणेश जी का एक नाम विघ्नहर्ता भी है। कहते हैं कि जो सच्चे मन से भगवान गणेश की आराधना करता है वे उनके सारे विघ्न हर लेते हैं। भगवान गणेश के पूजन से जीवन में सुख, शांति एवं समृद्दि आती है।

जानिए कब है गणेश चतुर्थी

इस साल गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi 2021) का पावन पर्व 10 सितंबर 2021 को शुक्रवार के दिन पड़ रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न काल गणेश पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इस दौरान विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कष्टों का निवारण होता है। इस दिन पूजा का शुभ मुहुर्त मध्याह्र काल में 11:03 से 13:33 तक है यानि 2 घंटे 30 मिनट तक है। 

ऐसे करें पूजा

>> सुबह जल्दी उठकर गणेश जी को जल चढ़ाकर उनकी पूजा करें।

>> दिन भर का उपवास रखें क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। दिन में किसी भी रूप में चावल, गेहूं और दाल का सेवन करने से बचें।

>> शाम के समय दूर्वा घास, फूल, अगरबत्ती और दीया से भगवान गणेश की पूजा करें।

>> पूरी पूजा विधि का पालन करते हुए गणेश मंत्रों का जाप करें।

>> मोदक और लड्डू चढ़ाएं जो भगवान गणेश को सबसे ज्यादा पसंद हैं।

>> चांदनी से पहले गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ किया जाता है।

>> चंद्रोदय के बाद व्रत तोड़ें। चंद्रमा का दिखना बहुत ही शुभ होता है। इसलिए जब चंद्रमा दिखाई दे तो अर्घ्य दें। लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को तुलसी पसंद नहीं थी, इसलिए उनकी पूजा करते समय कभी भी इसके पत्ते न चढ़ाएं।

जानिए गणेश पूजन का महत्व

मंगलमूर्ति और प्रथम पूज्य भगवान गणेश को संकटहरण भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस चतुर्थी के दिन व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से जहां सभी कष्ट दूर हो जाते हैं वहीं इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति भी होती है। ज्योतिषियों और पंडितों का कहना है कि इस दिन तिल दान करने का महत्व होता है। इस दिन गणेशजी को तिल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक देवी-देवताओं में सर्वोच्च स्थान रखने वाले विघ्न विनाशक भगवान गणेश की पूजा-अर्चना जो लोग नियमित रूप से करते हैं, उनकी सुख-समृद्घि में बढ़ोतरी होती है।

उज्जैन के पंडित आनंद शंकर व्यास ने बताया कि यह चतुर्थी संक्रांति के आसपास आती है। चूंकि यहीं से सभी शुभ कार्य शुरू होते हैं इसलिए गणेशजी की उपासना का भी सबसे ज्यादा महत्व है। उन्होंने कहा कि सामग्री न भी हो तो सच्चे मन से की गई किसी भी देवता की आराधना का फल अवश्य मिलता है। आचार्य रामचंद्र शर्मा वैदिक के अनुसार पुराणों में संकट चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है।

भगवान गणेश की अर्चना के साथ चंद्रोदय के समय अर्घ्य दिया जाता है। खासकर महिलाओं के लिए इस व्रत को उपयोगी माना गया है। मकर संक्रांति से दिन तिल-तिल कर बढ़ता है। इसलिए इसमें तिल या उससे बनी वस्तुओं को पूजा और प्रसाद में शामिल करने का महत्व है। भूमि अथवा जमीन और तिल के दान को सबसे अहम माना गया है। जहां देवताओं और पितरों के कार्य में तिल का उपयोग होता है वहीं हवन में भी तिल का उपयोग किया जाता है।

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