जानिए क्या है अमृत जल कृषि और इससे जुड़े फायदे

आधुनिक युग के साथ साथ कृषि का स्वरूप उसके तौर तरीके सब बदल रहे है। आज के समय में किसान ऑर्गेनिक खेती की ओर जा रहे है। यह खेती करने की प्राकृतिक पद्धति है। इसमें खेती के लिए सिर्फ उन चीजों का इस्तेमाल होता है जो प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध हैं। इसी का एक अंग है गौ आधारित खेती या अमृत जल कृषि पद्धित।

यह हमारे देश की ही अपनी पुरानी पद्धति है। जिसे लोग भूल चुके हैं। बस अब फिर से हमें उस ओर लौटना है। इसमें आधुनिक रिसर्च और तकनीक को मिला कर हम अमृत जल कृषि को बेहतर बना सकते हैं। इसके अनेक फायदे होंगे। गौ आधारित खेती में सिर्फ गाय का गोबर, गोमूत्र और गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। इन तीनों के मिश्रण को पानी में मिलाया जाता है इसे अमृत जल कहते हैं। 

अमृत जल क्या है? 

यह एक ऐसा घोल है जिसमें अवात जीवी सूक्ष्मजीवों की संख्या और विविधता बहुत अधिक होती है। इसमें मौजूद रासानिक तत्व मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं और सूक्ष्मजीव मिट्टी के भौतिक और रासानिक गुणों को बढ़ाते हैं। इसमें मौजद सूक्ष्मजीव निम्न कार्य करते हैं-

1. मिट्टी के पोषक तत्वों को पोषक जड़ों द्वारा उपयोग करने योग्य रुप में लाते हैं।
2. जैविक पदार्थों से ह्यूमस तैयार करते हैं। 
3. मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं।
4. उपयोगी रसायन तैयार करते हैं।  

अमृत जल तैयार करने के लिए आवश्यक सामग्री 

करीब 111 लीटर अमृत जल तैयार करने के लिए निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है; –
1. एक लीटर भारतीय नस्ल की गाय का गोमूत्र।
2. एक किलो ताजा गोबर।
3. एक सौ दस (110) लीटर पानी।
4. काला या देशी गुड़ 50 ग्राम या 12 अति पके हुए केले या 3 अमरुद के फल या कटहल की 12 कलो या 500 मिलीलीटर गन्ने का रस या काजू के 12 फल इसमें से जो भी उपलब्ध हो। 

विशेष- देशी गाय के गोमूत्र और गोबर की गुणवत्ता अच्छी होती है। अतः इसके उपयोग को प्राथमिकता दें। गोमूत्र जितना पुराना होगा उसकी गुणवत्ता उतनी अच्छी होगी। गोबर का ताजा होना बहुत जरुरी है क्योंकि ताजे गोबर में ही सूक्ष्मजीवों की संख्या ज्यादा होती है। काले गुड़ के उपयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि इसमें रासायन का इस्तेमाल नहीं होता। आवश्यकता के अनुसार अमृत जल तैयार करने के लिए सामग्री के अनुपात को स्थिर रखते हुए मात्रा परिवर्तित की जा सकती है।  

अमृत जल तैयार करने की विधि क्या है? 

सबसे पहले दस लीटर पानी में एक लीटर गोमूत्र मिलाएँ। अब इसमें एक किलो ताजे गोबर को अच्छी तरह घोलकर मिलाएं। इसके बाद 50 ग्राम गुड़ को पानी में तब तक पिघलाएं जब तक वह अच्छी तरह न घुल जाए। (गुड़ के एवज में 12 अतिपके हुए केले या 6 अमरुद के फल या कटहल की 12 कली या 500 मिलीलीटर गन्ने या काजू के 12 फल का रस इसमें से जो भी उपलब्ध हो, उसका उपयोग करें) अब इस मिश्रण को ढँककर रख दें।

दिन में 6 दफा इस मिश्रण को 12 बार घड़ी की दिशा में और 12 बार घड़ी की उलटी दिशा में घुमाएँ। घोल बनाने के 72  घंटों बाद इसमें 100 लीटर पानी मिलाएं। करीब 111 लीटर के इस घोल को अमृत जल कहा जाता है। 

विशेष- 

1. घोल में प्लास्टिक, पत्थर और धातु के टुकड़े न जाने दें। 
2. सूखे गुड़ के ढेलों को पीसकर मिलाने से वह जल्दी घुलता है। इसमें गुड़ के पर्याय के रुप में पके केले 12 या पके अमरुद के फल 6 या कटहल की 12 कलियाँ, काजू के 12 फल, गन्ने का ताजा आधा लीटर रस इस्तेमाल किया जा सकता है।
3. इसे हमेशा ढँककर रखें।

यह किसानों के लिए काफी फायदेमंद है क्योंकि इस पद्धति नें किसानों की खेती की लागत बेहद कम हो जाएगी। क्योंकि गोबर गोमूत्र उन्हें घर से ही मिल जाएगा। बीज घर से ही मिल जाएगा। सिर्फ गुड़ बाहर से खरीदना पड़ेगा। इस पद्धति से खेती करने पर 50 डिसमिल जमीन में किसानों को छह महीने में 1200 रुपए खर्च आयेगा। जबकि मुनाफा इससे कई गुणा अधिक होगा। क्योंकि उनके उत्पाद अच्छे दाम में बिकेंगे। रासायन नहीं होने के कारण विदेशों में भई उनके उत्पाद की मांग होगी।

इस खेती में भोजन की पौष्टिकता बनी रहती है। हम जो भी खाते हैं उसमे प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व मौजूद होते हैं। क्योंकि अमृत जल कृषि में सबसे मिट्टी में सारे पोषक तत्व प्राकृतिक रुप से बनते हैं। साथ ही जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है तो उपज भी अच्छी होती है। इस पद्धति में सिर्फ देसी बीज का ही इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि अगर हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल किया जाए तो उसमें रोग और कीट आते हैं, पर देसी बीज में यह समस्या नहीं होती है।

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