धर्मांतरण मामले की आड़ लेकर हिंदू-मुस्लिम और पूरे मुस्लिम समाज को निशाने पर लेना ठीक नहीं: बसपा प्रमुख मायावती

बसपा प्रमुख मायावती ने सोमवार को ट्वीट कर संघ प्रमुख मोहन भागवत पर साधा निशाना कहा, धर्मांतरण मामले की आड़ लेकर हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाना और पूरे मुस्लिम समाज को निशाने पर लेना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत का धर्म को लेकर दिया गया बयान मुंह में राम और बगल में छुरी जैसा है। इनके बयान पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। मायावती ने धर्मांतरण के मुद्दे पर भी खुलकर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जबरन और लालच

देकर धर्मांतरण कराना गलत है। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। 
मायावती ने सोमवार को ट्वीट कर कहा, “RSS प्रमुख का कल दिया गया बयान लोगों को अविश्वसनीय लगता है। जब तक RSS और BJP एंड कंपनी और इनकी सरकारों की संर्कीण सोच और कार्यशैली में सर्व समाज हितैषी सामाजिक परिवर्तन नहीं आएगा, तब तक इनकी बातों पर मुस्लिम समाज द्वारा विश्वास करना मुश्किल लगता है।” 

बसपा प्रमुख मायावती ने आगे कहा-
“देश में लालच और डरा-धमकाकर धर्म परिवर्तन कराना ठीक नहीं है। ऐसे मामलों की सही जांच कराकर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अगर इसके पीछे कोई भी देश विरोधी साजिश है तो ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। धर्मांतरण के मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम करना और पूरे मुस्लिम समाज को निशाने पर लेना ठीक नहीं है। BSP इसका पुरजोर विरोध करेगी। अगर धर्म परिवर्तन की आड़ में यह साजिश चल रही है, तो इतने लंबे समय से अपने देश की खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं?”

मोहन भागवत के इस बयान पर बवाल
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को गाजियाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि-
“सभी भारतीयों का DNA एक है, भले ही वे किसी भी धर्म के क्यों न हों। हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें भी भ्रामक हैं, क्योंकि ये दोनों अलग नहीं, बल्कि एक हैं। लोगों के बीच पूजा पद्धति के आधार पर अंतर नहीं किया जा सकता है। ये सिद्ध हो चुका है कि हम पिछले 40 हजार साल से एक पूर्वजों के वंशज हैं। इसमें एकजुट होने जैसी कोई बात नहीं है, सभी लोग पहले से ही एक साथ हैं।”

आरएसएस एकता की नही नफरत की बात करता है: असदुद्दीन ओवैसी

मोहन भागवत के लिंचिंग को लेकर दिए गए बयान पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाते हुए कहा था की, आरएसएस प्रमुख यदि मानते हैं कि लिंचिंग हो रही है तो यह करवा कौन रहा है? ओवैसी ने सवाल किया था कि,  अगर वह आरएसएस प्रमुख वाकई लिंचिंग को बीमारी समझते हैं तो उनको इसे अस्वीकार करना पड़ेगा। एकता की बात भारत का संविशन करता है। हिंदुत्व एकता की बात नहीं करता।

असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा था “हम मोहन भागवत जी से पूछना चाहते हैं की मेजोरिटी कम्युनिटी में आरएसएस (RSS) की वजह से कट्टरता बढ़ चुकी है तो क्या जिन लोगों की लिंचिंग की गई, उनको जिन्होंने मारा उनका आरएसएस विरोध करेगा। अगर आरएसएस मानती है लिंचिंग हो रही है तो यह करवा कौन रहा है?” उन्होंने कहा था कि, यह लोग मुसलामनों को गाली देते हैं लेकिन पुलिस कोई एक्शन नहीं लेती। यह सिर्फ बोलने की बात करते हैं, जनता की आंख में धूल झोंकी जा रही है। जमीन पर कुछ नहीं हो रहा है।

ओवैसी ने ताबड़तोड़ ट्वीट करते हुए लिखा,

“RSS के भागवत ने कहा लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व विरोधी। इन अपराधियों को गाय और भैंस में फ़र्क़ नहीं पता होगा लेकिन क़त्ल करने के लिए जुनैद, अखलाक़, पहलू, रकबर, अलीमुद्दीन के नाम ही काफी थे। ये नफ़रत हिंदुत्व की देन है, इन मुजरिमों को हिंदुत्ववादी सरकार की पुश्त पनाही हासिल है। कायरता, हिंसा और क़त्ल करना गोडसे की हिंदुत्व वाली सोच का अटूट हिस्सा है। मुसलमानों की लिंचिंग भी इसी सोच का नतीजा है। केंद्रीय मंत्री के हाथों अलीमुद्दीन के कातिलों की गुलपोशी हो जाती है, अखलाक़ के हत्यारे की लाश पर तिरंगा लगाया जाता है, आसिफ़ को मारने वालों के समर्थन में महापंचायत बुलाई जाती है, जहां भाजपा का प्रवक्ता पूछता है कि क्या हम मर्डर भी नहीं कर सकते?”

भागवत का संघ के भीतर ही विरोध

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के मुसलमानों के साथ हिंदुओं के रिश्ते पर बयान ने वैचारिक गर्मी पैदा कर दी है। संघ में ही बहुत से लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। इन लोगों का कहना है कि गुरुजी गोलवलकर के जमाने में हिंदुत्व को लेकर संघ की सोच इससे अलग रही थी। करीब 50 साल बाद शायद ऐसे हालात फिर से बनते दिख रहे हैं जब संघ प्रमुख के विचार को लेकर संघ के भीतर ही आवाजें उठने लगी हैं। सूत्रों के मुताबिक विरोध के स्वर खास तौर से नागपुर, असम और पश्चिम बंगाल से आए हैं। 

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