IISER वैज्ञानिकों का ई कोलाई बैक्टीरिया पर अध्ययन

बहु-दवा प्रतिरोध (Multi-drug resistance) तेजी से एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा बनता जा रहा है। दुनिया भर के वैज्ञानिक इस समस्या से निपटने के तरीके खोजने पर काम कर रहे हैं। एक प्रमुख मुद्दा यह रहा है कि कुछ बैक्टीरिया बहु-दवा प्रतिरोध (multi-drug resistance) विकसित करते हैं जबकि कुछ अन्य नहीं करते हैं। इसका कारण अभी पता नहीं चल पाया है।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (Indian Institutes of Science Education and Research) – पुणे में जनसंख्या जीवविज्ञान प्रयोगशाला में एक नया अध्ययन इस और कई अन्य समान रहस्यों को समझने में मदद करने का वादा करता है।

आईआईएसईआर (IISER), यशराज चव्हाण , सार्थक मालुसरे और सुतीर्थ डे के वैज्ञानिकों ने ई कोलाई बैक्टीरिया (E Coli bacteria) पर अपना अध्ययन किया। उन्होंने अलग-अलग वातावरण में अलग-अलग आबादी के आकार वाले बैक्टीरिया के नमूने विकसित किए और फिर उन्हें पूरे-जीनोम, संपूर्ण-जनसंख्या अनुक्रमण विश्लेषण के अधीन किया। उन्होंने पाया कि एक छोटे जनसंख्या आकार वाले नमूनों ने उत्परिवर्तन का एक निश्चित समूह प्राप्त किया जो उन्हें एक निश्चित वातावरण में जीवित रहने की अनुमति देता है लेकिन दूसरों में नहीं।

बड़ी आबादी वाले नमूनों ने भी इन उत्परिवर्तन को विकसित किया। हालांकि, उन्होंने कुछ निश्चित प्रतिपूरक उत्परिवर्तन विकसित किए जो एक साथ उन्हें कई वातावरणों में जीवित रहने में मदद करते हैं। यह स्पष्ट था कि जनसंख्या के आकार ने बैक्टीरिया के लिए उपलब्ध उत्परिवर्तन के प्रकार को निर्धारित किया, जो बदले में उनके द्वारा प्राप्त की जाने वाली फिटनेस की ओर जाता है।

शोधकर्ताओ ने चार प्रकार के स्थिर वातावरण में ई. कोलाई (E Coli bacteria) की लगभग 480 पीढ़ियों का अध्ययन किया। जिसमें विभिन्न कार्बन स्रोत, गैलेक्टोज, थाइमिडीन, माल्टोस और सोर्बिटोल शामिल हैं, और एक उतार-चढ़ाव वाला वातावरण जिसमें कार्बन स्रोत चार स्रोतों के बीच अप्रत्याशित रूप से बदल गया।

यह अध्ययन इसलिए महत्व रखता है क्योंकि अब तक यह समझा गया था कि बैक्टीरिया की बहु-दवा प्रतिरोध (multi-drug resistance) विकसित करने की क्षमता उस पर आधारित थी जिसे ‘फिटनेस कॉस्ट’ (fitness cost ) कहा जाता था। जब बैक्टीरिया एक वातावरण में फिट हो जाते हैं, तो वे अन्य वातावरण में या तो फिटनेस खो देते हैं या बढ़ने में विफल हो जाते हैं। नए अध्ययन ने यह दिखाते हुए स्पष्ट किया है कि जब पर्यावरण में उतार-चढ़ाव होता है, तो बड़ी आबादी इस प्रभाव को दरकिनार कर सकती है।

हालांकि, शोध कार्य केवल यह दर्शाता है कि बड़ी आबादी का आकार उतार-चढ़ाव वाले वातावरण में मदद कर सकता है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कट-ऑफ आकार (cut-off size) क्या है। यह एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में भिन्न होगा। विभिन्न प्रकार के जीवों के लिए उनका पता लगाना दिलचस्प होगा। वैज्ञानिकों ने ‘इकोलॉजी लेटर्स’ (Ecology Letters) जर्नल में एक पेपर मे इसे प्रकाशित भी किया है।

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