भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किए कूल्हे और घुटने के प्रत्यारोपण हेतु बनाए जाने वाले इम्प्लान्ट्स

नई दिल्ली, 13 अक्टूबर (विज्ञान एवम प्रौद्योगिकी मंत्रालय): भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसे विश्लेषणात्मक मॉडल विकसित किए हैं जिनसे कूल्हे और घुटने के प्रत्यारोपण में सुधार के लिए उनके अनुकूलन में सहायता करते हुए विद्युतीय प्रवाह से निर्मित सतहों की स्थलाकृति का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और फिर इनका अनुकूलन करने बाद कूल्हे और घुटने के प्रत्यारोपण हेतु बनाए जाने वाले इम्प्लान्ट्स में इनका उपयोग किया जा सकता है।

विद्युतीय प्रवाह से निर्मित (ईटीडी) सतहों में ऊतकों की वृद्धि और आपसी जुड़ावा को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त सतह स्थलाकृति तथा उसके लिए आवश्यक रासायनिक घटक विद्यमान हैं। ईडीटी सतहों में उनकी भूतलीय स्थलाकृति का पूर्वानुमान लगाना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रक्रिया विशेष रूप से ऐसी यादृच्छिक (रैंडम) सतह का निर्माण करती है जिसके बारे में पूर्वानुमान लगाना बहुत कठिन होता है।

विभिन्न अनुप्रयोगों जैसे कि आर्थोपेडिक प्रत्यारोपण और शरीर के अंदर लगाए जाने वाले बाह्य उपकरणों के रेक फेस के लिए ईडीटी सतह स्थलाकृतियों को अनुकूलित करने के लिए, स्थलाकृति भविष्यवाणी के उपयुक्त तरीकों के माध्यम से डिजाइन चरण में ही ऐसी स्थलाकृति को जानने की आवश्यकता पडती है।

इस हेतु भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बम्बई, मुम्बई के प्रोफेसर डॉ. सुहास एस. जोशी ने सतही स्थलाकृति का पूर्वानुमान लगाने के लिए ऐसे विश्लेषणात्मक और संख्यात्मक मॉडल विकसित किए जो प्रयोगात्मक आंकड़ों के विपरीत मान्य थे।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के उन्नत विनिर्माण प्रौद्योगिकी कार्यक्रम द्वारा समर्थित और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के साथ संरेखित यह कार्य हाल ही में ‘सरफेस टोपोग्राफी: मेट्रोलॉजी एंड प्रॉपर्टीज’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है और इसे ‘जर्नल ऑफ मैटेरियल्स प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी’ में प्रकाशन के लिए भी स्वीकार किया गया है।

विद्युतीय प्रवाह से निर्मित (ईटीडी) परिस्थिति का उपयोग करके उत्पन्न की गई ऐसी स्थलाकृतियां अपने विश्लेषणात्मक और संख्यात्मक अनुकरण प्रयोगात्मक आंकड़ों (डेटा) के अनुसार ही सामंजस्य में है और इनको ऐसे मॉड्यूल में विकसित किया जा सकता है जिसका उपयोग विभिन्न मानकों (पैरामीटर्स) के संयोजनों पर सतह निर्माण के पूर्वानुमानों के लिए किया जा सकता है।

स्थलाकृति पूर्वानुमान का यह मॉड्यूल गैर-बनावट वाली सतहों की तुलना में उच्च प्रोटीन अवशोषण के साथ निर्मित सतहों के ऐसे कुशल और कम लागत वाले उत्पादन में मदद कर सकता है, जो कूल्हे और घुटने के प्रत्यारोपण जैसे आर्थोपेडिक प्रत्यारोपण के लिए अनुकूल है। विकसित की गई यह प्रौद्योगिकी अपनी प्रौद्योगिकी तैयारी स्तर (टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल) के छठे स्तर में है ।

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