भारतीय वैज्ञानिकों ने मानव बाल, ऊन और मुर्गी के पंखों को पशुओं के लिये चारा और उर्वरक में बदलने की एक नई विधि विकसित की

नई दिल्ली, 18 सितंबर (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय): भारतीय वैज्ञानिकों ने मानव बाल, ऊन और मुर्गी के पंखों जैसे केराटिन अपशिष्ट को उर्वरकों, पालतू जानवरों और जानवरों के चारे में बदलने के लिए एक नया टिकाऊ और किफायती समाधान विकसित किया है। भारत हर साल बड़ी मात्रा में मानव बाल, मुर्गी के पंखों के अपशिष्ट और ऊन के अपशिष्ट का उत्पादन करता है। इन अपशिष्ट को फेंक दिया जाता है, जमीन में दबा दिया जाता है, लैंडफिलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है, या जला दिया जाता है, जिससे पर्यावरणीय खतरे, प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ जाता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है।

ये अपशिष्ट अमीनो एसिड और प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैं, जो पशु चारा और उर्वरक के रूप में उपयोग किये जाने की उनकी क्षमता को रेखांकित करते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी मुंबई के कुलपति प्रोफेसर ए बी पंडित ने अपने छात्रों के साथ केराटिन अपशिष्ट को पालतू जानवरों के भोजन और पौधों के लिए उर्वरकों में बदलने की एक तकनीक विकसित की है। पेटेंट की जा चुकी यह नई तकनीक, आसानी से बड़े स्तर पर इस्तेमाल योग्य, पर्यावरण के अनुकूल, ऊर्जा-दक्ष है, और यह अमीनो एसिड युक्त लिक्विड फर्टिलाइजर को वर्तमान में बाजार में मिल रहे उत्पादों की तुलना में अधिक किफायती बनाएगी।

उन्होंने अपशिष्ट को बिक्री योग्य उर्वरकों और पशु आहार में बदलने के लिए उन्नत ऑक्सीकरण का उपयोग किया। इसके पीछे की प्रमुख तकनीक में शुरुआती प्रक्रिया के बाद हाइड्रोडायनैमिक केविटेशन नाम की एक तकनीक के जरिये केराटिन का जल-अपघटन शामिल है, जिसमें बहते तरल में वाष्पीकरण, बबल फॉर्मेशन और बबल इम्प्लोशन का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह के रूपांतरण के लिए मौजूदा रसायनिक और भौतिक तरीकों में ऊर्जा का अधिक इस्तेमाल होता है, और ये रासायनिक रूप से खतरनाक हैं, और इसमें कई चरण शामिल होतें हैं जिसके परिणामस्वरूप अंतिम उत्पाद की लागत बढ़ती है।

इस तकनीक के साथ, जैसा कि टीम द्वारा गणना की गयी है, बड़े पैमाने पर स्थापित संयंत्र में प्रति 1 टन कच्चे माल को संसाधित करने की लागत, बाजार में मौजूदा उत्पाद की तुलना में 3 गुना सस्ती है। वैज्ञानिक वर्तमान में रेवोल्टेक टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड, गुजरात के सहयोग से इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। उत्पादन में इस प्रगति से तरल जैवउर्वरक जो कि बाजार में मौजूद उत्पादों की तुलना में तीन गुना अधिक कारगर हैं, किसानों को सस्ती दर पर उपलब्ध होंगे।

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