जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तपन का भारत में प्रभाव

देश भर में जलवायु परिवर्तन को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। सालों से जलवायु परिवर्तन के विषय पर शोधकर्ता वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि वर्ष 2070 तक धरती का तापमान इतना अधिक बढ़ जाएगा कि यहां रहना तकरीबन असंभव हो जाएगा। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तर पश्चिम में उच्च दबाव का क्षेत्र बनने से गर्मी की यह लहर यानी हीट वेव पैदा हुई है, लेकिन इसे खतरनाक स्तर तक ले जाने के लिए जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि काबर्न उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई तो परिणाम बेहद गंभीर होंगे। साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में दावा किया गया था कि कई ऐसी जगहों पर जहां पहले गर्मी न के बराबर थी, वहां भी अब तापमान लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। वहीं, इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनीटरिंग सेंटर (आईडीएमसी) की ओर से हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल यानी 2021 तूफान, बाढ़, जंगल की आग और सूखे की वजह से करीब तीन करोड़ लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। 

हाल ही के वर्षों में देश में आने वाले चक्रवाती तूफानों की आवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ी है। बात चाहे तौकते तूफान की करें या अम्फान की। वैश्विक तपन में वृद्धि के कारण तूफान और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी बढ़ोतरी हो रही है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन 15 वर्षों में 45 मिलियन भारतीयों को अत्यधिक निर्धन बना सकता है जिससे आर्थिक प्रगति बाधित हो सकती है।

इसके साथ ही समुद्र का बढ़ता तापमान कोरल रीफ के लिये खतरा उत्पन्न कर सकता है। गौरतलब है कि कोरल रीफ वस्तु एवं सेवाओं के रूप में अनुमानतः लगभग 375 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष उत्पादन करता है। जलवायु परिवर्तन पर भारत सरकार की ओर से कुछ साल पहले एक कार्य योजना तैयार कराई गई थी। उसमें चिंता जताई गई थी कि वर्ष 2021 से आने वाले साल 2050 के दौरान समुद्री तापमान में 1.8 से 2.4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है।

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के एक अध्ययन में आशंका जताई गई है कि अरब सागर में चक्रवातों की फ्रीक्वेंसी और तीव्रता दोनों में वृद्धि हो रही है। उल्लेखनीय है कि बंगाल की खाड़ी में बनने वाले हर चार चक्रवातों की तुलना में अरब सागर में केवल एक चक्रवात बनता है। ऐसे में आईआईटीएम का अध्ययन कई चिंताएं पैदा करता है। पर्यावरणविद वैश्विक तपन के लिए कोयले को सबसे बड़ी वजह करार देते हैं। जबकि भारत अभी बिजली उत्पादन के लिए कोयला आधारित ताप बिजली घर पर निर्भर है। ये प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत रहे हैं। 

वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्ष 2100 तक ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समुद्री जलस्तर एक मीटर तक ऊंचा हो जाएगा। इससे चक्रवात, बाढ़, सुनामी जैसी आपदाओं में भी बढ़ोतरी होगी। कई ग्लेशियर और हिम क्षेत्र समुद्र में समाते जा रहे।
भारत की अधिकांश कृषि वर्षा आधारित है जिस पर मानसून की अनिश्चितता बनी रहती है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून और अधिक अनिश्चितता हुआ है।

साथ ही वर्षा के असामान्य वितरण से कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा जैसी स्थितियाँ दृष्टिबोचर हो रही हैं। साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते तापमान से हिमालय, अलास्का, आइसलैंड, आल्पस और पामीर का बर्फीला इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। 2000 से 2010 के बीच कार्बन उत्सर्जन की हमारी दर पिछले दशक की तुलना में चार गुना बढ़ चुकी है।

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