अगर आपके शरीर में भी है लाल-लाल चकत्ते तो ना करें नजरंदाज, हो सकते है सोरायसिस के लक्षण, जानिए क्या है सोरायसिस

शरीर के किसी भी हिस्से में लाल-लाल चकत्ते और खुजली होना सोरायसिस का इशारा होता है। यह एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है। आमतौर पर लोग इसे स्किन की सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज करते हैं, लेकिन यह पूरे शरीर में फैल सकता है। आज दुनिया भर में हर दूसरा और तीसरा इंसान सोरायसिस से पीड़ित है। केवल भारत में ही इस से करीब 2.5 करोड़ जूझ रहे है। हर साल 29 अक्टूबर को विश्व सोरायसिस दिवस मनाया जाता है।

यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, लेकिन खासतौर पर कोहनी, घुटने और लोवर बैक वाले हिस्सों में इसका असर ज्यादा दिखता है। हालांकि यह फैलने वाला नही होता है। यानी की अगर एक इंसान इससे पीड़ित है तो दूसरे इंसान के छूने से यह उसमे नहीं फैल सकता। सोरायसिस से जूझने वाले लोगों को एक तरह का आर्थराइटिस भी हो सकता है। इसे सोरियाटिक आर्थराइटिस कहते हैं। ऐसा होने पर जोड़ों में दर्द होता है। नेशनल सोरायसिस फाउंडेशन के मुताबिक, सोरायसिस से जूझने वाले 10 से 30 फीसदी लोग सोरियाटिक आर्थराइटिस से जूझते हैं।

ऐसा माना जाता है कि रोगों से बचाने वाले शरीर के इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी होने पर सूजन होती है और स्किन कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं। नतीजा, सोरायसिस के लक्षण दिखते हैं। यह आनुवांशिक बीमारी है लेकिन जरूरी नहीं कि हर पीढ़ी में इसके मामले दिखें। जैसे- दादा के सोरायसिस से जूझने पर हो सकता है कि उनके बेटे में न होकर उनके पोते में यह बीमारी दिखे। एक्सपर्ट कहते हैं, सोरायसिस के एक तिहाई मरीज मनोरोगी हो जाते हैं। इनमें डिप्रेशन और तनाव के मामले सामने आते हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लें ताकि इसे बढ़ने से रोका जा सके।

सोरायसिस क्या है

सोरायसिस त्वचा से जुड़ी ऑटोइम्यून डिजीज है। इस रोग में त्वचा पर कोशिकाएं तेजी से जमा होने लगती हैं। सफेद रक्त कोशिकाओं के कम होने के कारण त्वचा की परत सामान्य से अधिक तेजी से बनने लगती है, जिसमें घाव बन जाता है। यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। बीमारी के बढ़ जाने पर लाल चकत्ते से खून निकल सकता है। कभी-कभी इसमें सूजन भी हो जाती है। यह मानसिक विकार भी उत्पन्न कर सकती है।

सोरायसिस के प्रकार:-इन्वर्स सोरायसिस : इसमें स्तनों के नीचे, बगल, कांख, या जांघों के ऊपरी हिस्से में लाल-लाल बड़े चकत्ते बन जाते हैं। ये ज्यादा पसीने और रगड़ने के कारण होते हैं।

सोरियाटिक अर्थराइटिक : ये सोरायसिस और अर्थराइटिस का जोड़ है। 70 फीसदी रोगियों में तकरीबन 10 साल की उम्र से इस सोरायसिस की समस्या रहती है। इसमें जोड़ों में दर्द, उंगलियों और टखनों में सूजन आदि जैसी समस्याएं होती हैं।

एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस : इसमें चेहरे सहित शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लाल चकत्ते हो जाते हैं। शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है। हदय की गति बढ़ जाती है। यह पूरी त्वचा में फैल जाती है। इससे त्वचा में जलन भी होती है। इसमें खुजली, ह्रदय गति बढ़ने और शरीर का तापमान कम ज्यादा होने जैसी समस्याएं होती हैं। इसके कारण संक्रमण, निमोनिया भी हो सकता है।

पस्चुलर सोरायसिस : ये एक दुर्लभ तरह का रोग है। ये ज्यादातर वयस्क में पाया जाता है। इसमें अक्सर, हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लाल दानें हो जाते हैं, जिसमें मवाद हो जाता है। ये देखने में संक्रमित प्रतीत होता है। यह ज्यादातर हाथों और पैरों में होता है, लेकिन यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इसके कारण कई बार बुखार, मतली आदि जैसी समस्याएं भी हो जाती हैं।

गटेट सोरायसिस : यह अक्सर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर होती है। यह छोटे-छोटे लाल-गुलाबी दानों के रूप में दिखाई पड़ती है। यह ज्यादातर हाथ के ऊपरी हिस्से, जांघ और सिर पर होती है। तनाव, त्वचा में चोट और दवाइयों के रिएक्शन के कारण यह रोग होता है। इससे प्रभावित त्वचा पर प्लेक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है। अनेक रोगियों में यह अपने आप, या इलाज से चार छह हफ्तों में ठीक हो जाती है। कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में भी परिवर्तित हो जाती है।

प्लेक सोरायसिस : प्लेक सोरायसिस एक आम तरह का सोरायसिस है। 10 लोगों में 8 लोग इसी सोरायसिस के शिकार होते हैं। प्लेक सोरायसिस के कारण शरीर पर सिल्वर (चांदी) रंग और सफेद लाइन बन जाती है। इसमें लाल रंग के धब्बे के साथ जलन होने लगती है। यह शरीर के किसी भी हिस्से पर हो सकती है, लेकिन ज्यादातर कोहनी, घुटने, सिर, पीठ में नीचे की ओर होती है। इसमें त्वचा पर लाल, छिलकेदार मोटे या चकत्ते निकल आते हैं। इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है।

सोरायसिस का कारण:-
>> तनाव, धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन करने से भी सोयरासिस से ग्रस्त हो सकते हैं।
>> शरीर में विटामिन डी की कमी होने, एवं उच्च रक्तचाप से संबंधित कुछ दवाइयां खाने से भी यह रोग होता है।
>> त्वचा पर कोई घाव जैसे- त्वचा कट जाना, मधुमक्खी काट लेना या धूप में त्वचा का झुलसना। यह सोयरासिस होने का कारण बन सकता है।

>> जब शरीर की रोग प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर हो जाती है, तो नयी कोशिकाएं तेजी से बनने लगती हैैं। यह त्वचा इतनी कमजोर होती है कि पूरी बनने से पहले ही खराब हो जाती हैं। इसमें लाल दाने और चकत्ते दिखाई देने लगते हैं।

>> यह एक आनुवांशिक बीमारी है, जो परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी एक से दूसरे को होती है।अगर माता-पिता में से किसी एक को यह रोग है, तो बच्चों को यह रोग होने की सम्भावना 15% तक बढ़ जाती है।अगर माता-पिता दोनों को यह बीमारी है तो बच्चों को यह रोग होने की सम्भावना 60% अधिक हो जाती है।

>> कई बार वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन भी इस रोग का कारण बनता है। यदि आप गले के अलावा त्वचा के इंफेक्शन से पीड़ित हैं, तो ये सोरायसिस से ग्रस्त हो सकते हैं। यदि आपके घर में कोई व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है, तो यह समस्या आपको भी हो सकती है।

सोरायसिस से प्रभावित होने वाले अंग:-

सोरायसिस 20 से 30 वर्ष की आयु में होती है, जो शरीर के इन अंगों में हो सकती है।
• हथेलियों
• पांव के तलवे
• कोहनी
• घुटने
• सोयसाइसिस पीठ पर अधिक होता है।
• सोयराइसिस किसी भी उम्र में नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों को भी हो सकती है।

सोरायसिस के लक्षण:-

• खुजली, जलन, या दर्द।
• कठोर या सूजे हुए जोड़।
• खड़े हुए, कटे हुए, या मोटे नाखून।
• सूखी, फटी त्वचा जिसमें खुजली हो सकती है या खून निकल सकता है।
• त्वचा पर लाल धब्बे, विशेष रूप से कोहनी, घुटनों और खोपड़ी पर, जो मोटी, चांदी के तराजू से ढके होते हैं।
• छोटे स्केलिंग स्पॉट , जो आमतौर पर बच्चों में देखे जाते हैं।

ख़तरा कब बढ़ जाता है:-

• तनाव
• तंबाकू
• शराब
• मौसम (बहुत ठंडा)
• संक्रमण – कुछ दवाइयों की एलर्जी से
• शरीर के किसी हिस्से में लगी चोट, जिससे त्वचा कट गई हो

हर रोज़ अगर इन सबसे आप दो चार हो रहे हों तो इस बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाती है।

इलाज

इसे पूरी तरह से खत्म करना मुमकिन नहीं है, लेकिन इलाज के जरिए इसकी गंभीरता और लक्षणों में कमी लाई जा सकती है। सोरायसिस का इलाज क्रीम, ऑइंटमेंट और फोटो थैरेपी से किया जाता है। इसके साथ मरीज की स्थिति के मुताबिक, नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेट्री ड्रग्स दिए जाते हैं। इसके अलावा बायोलॉजिकल लिविंग सेल वाले इंजेक्शन से भी मरीज का इलाज किया जाता है। इंजेक्शन में मौजूद दवा उन प्रोटीन को टार्गेट करती है जो बीमारी में अहम भूमिका निभाते हैं।

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