भारत के इन जगहों पर नहीं मनाई जाती है होली….होली के नाम पर कांप उठते है लोग, जानिए क्यों??

रंगों के त्‍योहार होली का जहां सबको बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दिन सभी लोग एक दूसरे रंग-गुलाल लगाते है। होली तो वैसे सभी धर्मों और समुदायों के लोग पूरे दिल से मनाते हैं लेकिन देश में ऐसे भी कई हिस्से हैं जहां होली नहीं मनाई (Celebrated) जाती है। वहीं हमारे देश में कुछ ऐसी भी जगहें हैं जहां होली का नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं। यही वजह है क‍ि इन जगहों पर कभी भी होली के रंग नहीं ब‍िखरते। आज हम आपको ऐसी ही कुछ जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां के लोग होली(Holi 2020) नहीं मानते।
मुन्नार (Munnar) 
दक्षिण भारत के कई शहरों में होली नहीं मनाई जा जाती हैं। ऐसा ही एक शहर है मुन्नार (Munnar) जहां लोग ज्यादा रंग-गुलाल नहीं खेलते। यहां शायद ही कोई किसी को रंग लगाता हो। यहां के लोग होली का त्योहार नहीं मनाते हैं।
अंडमान-निकोबार (Andaman Nicobar) 
यहां भी लोग होली खेलने से कतराते हैं। निकोबार का हैवलॉक आइलैंड काफी फेमस है। यहां लोग स्कूबा डाइविंग के लिए आते हैं। यहां के लोग बताते हैं कि होली रंगो का त्योहार है इससे शरीर में कई रोग हो जाते हैं जिसके चलते सब रंगों से दूर रहते हैं।

महाबलीपुरम (Mahabalipuram)
महाबलीपुरम शहर अपने मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। लेकिन यहां के लोग भी होली नहीं मनाते हैं। होली वाले दिन भी यहां सब सामान्य रहता है। हां होली की कोई भीड़ भाड़ नहीं होती, ना ही रंग-गुलाल उड़ाए जाते हैं।

बुंदेलखंड (Bundelkhand)
बुंदेलखंड के सागर जिले के हथखोह गांव के लोग होली नहीं मनाते हैं। इतना ही नहीं गांव के लोग होलिका का दहन भी नहीं करते हैं। इस गांव के रहने वाले लोग बताते हैं कि सालों पहले देवी ने साक्षात दर्शन दिए थे और लोगों से होली न जलाने को कहा था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
रायबरेली (Rae Bareilly)
रायबरेली के डलमऊ क्षेत्र के खजूरी गांव में होली के दिन रंग नहीं बिखेरे जाते, बल्कि यहां उस द‍िन शोक मनाते हैं। स्‍थानीय न‍िवास‍ियों का कहना है कि पुराने समय में खजूरी गांव के किले को मुगल शासकों ने होली के दिन ही ध्‍वस्‍त कर दिया था। सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी। तब से आज तक होली पर्व नहीं मनाया जाता है। 
उत्तराखण्ड (Uttarakhand)
उत्‍तराखंड के क्‍वीली, कुरझण और जौंदली गांव में तकरीबन 150 सालों से होली नहीं मनाई गई। यह गांव रूद्रप्रयाग के अगस्‍त्‍यमुनि ब्‍लॉक में हैं। इन गांवों में होली के दिन शोक मनाए जाने के पीछे कई सारी मान्‍यताएं हैं। इसमें पहली मान्‍यता है कि इस गांव की इष्‍टदेवी मां त्रिपुर सुंदरी देवी हैं। कहा जाता है कि मां को हुड़दंग पसंद नहीं है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि इस गांव में जब डेढ़ सौ साल पहले लोगों ने होली खेलने की कोशिश की तो तीनों ही गांव हैजा की चपेट में आ गए। इसके बाद किसी ने भी होली मनाने का साहस नहीं जुटाया।

राजस्‍थान (Rajasthan)
राजस्थान में ब्राह्मण जाति के लोग होली नहीं मनाते। इसके पीछे कहा जाता है कि एक अरसे पहले इसी जाति की एक महिला होली के दिन होलिका की पवित्र अग्नि के फेरे लगा रही थी तभी उसका बेटा होलिका में गिर गया। इसके बाद बच्‍चे को बचाने के चक्‍कर में महिला की मौत हो गई। कहा जाता है कि जिस वक्‍त उस महिला की मौत हुई वह अपने बेटे के गम में इतनी आहत थी कि उसने मरते-मरते कहा कि अब कभी कोई इस गांव में होली नहीं मनाएगा। इस घटना के बाद से इस जनजाति के लोग होली मनाने का साहस नहीं जुटा पाए। अरसा बीत गया लेकिन आज भी इस जाति के लोग यहां शोक ही मनाते हैं।

झारखंड (Jharkhand)
आपको जानकर हैरानी होगी लेक‍िन यह सच है क‍ि झारखंड के बोकारो जिले के दुर्गापुर गांव के लोग होली के नाम से डरते हैं। यहां होली के द‍िन लोग भूलकर भी एक-दूसरे को रंग नहीं लगाते। कहते है जब भी गांव में होली का आयोजन होता था यहां कभी भयंकर सूखा पड़ जाता था या फिर महामारी का सामना करना पड़ता था, जिससे गांव में कई लोगों की मौत हो जाती थी।  

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