क्या आपने कभी सोचा है जो पाप आप गंगा में धोने जाते है वह आखिर जाता कहां है?? आइए जानिए

ऐसी मान्यता है की गंगा स्नान करने के बाद हमारे द्वारा किए गए जीवन के सारे पाप धुल जाते है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की गंगा में पाप धोने के बाद हमारा किया गया पाप कहां जाता है??? क्या आपने कभी सोचा है की हजारों लोगों के स्नान करने के बाद भी गंगा कभी मैली क्यों नहीं होती?? तो आज हम आपके इन सभी सवालों का जवाब लेकर आए है। आज हम आपको आपके किए गए पाप से लेकर मां गंगा तक के सारे सवाली का जवाब देंगे।

पुराणों के अनुसार एक समय गंगा नदी करोड़ों लोगों के स्नान के कारण प्रदूषित हो गई थी अत: स्वयं की शुद्धि के लिए वह एक काली गाय का रूप लेकर नर्मदा नदी के पवित्र जल में स्नान करने आई थी। बताते है कि अब भी साल में एक बार मई-जून के मध्य में एक ऐसा पर्व आता है जब गंगा नर्मदा से मिलने के लिए आती हैं और स्नान करती हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी एवं कावेरी के साथ नर्मदा भारत की 5 सबसे पवित्र नदियों में शामिल है। एवं ऐसा माना जाता है कि इनमें से किसी में भी स्नान करने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है।

आइए जानते है मां गंगा कभी मैली क्यों नहीं होती, आखिर हमारा पाप जाता कहां है…

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते हैं तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गई। अब यह जानने के लिए तपस्या की कि पाप कहां जाता है। तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए तो ऋषि ने पूछा कि भगवान जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहां जाता है? भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं। दोनों गंगा जी के पास गए और कहा, ‘‘हे गंगे! जो लोग आपके यहां पाप धोते हैं इसका मतलब आप भी पापी हुईं।’’ 

इस पर गंगा जी ने कहा, “मैं क्यों पापी हुई? मैं तो सारे पापों को लेकर जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं।” अब वे लोग समुद्र के पास गए, “हे सागर! गंगा पाप आपको अर्पित कर देती है। इसका मतलब आप भी पापी हुए।” समुद्र ने कहा, ” मैं क्यों पापी हुआ मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बनाकर बादल बना देता हूं।” अब वे बादल के पास गए और कहा, “हे बादलो, समुद्र जो पापों की भाप बनाकर बादल बना देते हैं इसका मतलब आप पापी हुए।’”

बादलों ने कहा, “मैं क्यों पापी हुआ मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसाकर धरती पर भेज देता हूं जिससे अन्न उपजता है जिसे मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के अनुसार मानव की मानसिकता बनती है। इसीलिए कहते हैं जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।”

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