विज्ञान संचार पर होगा जोर

नवनीत कुमार गुप्ता
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के द्वारा देश दिनों दिन विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। हालांकि आज भी अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जो विकास की राह में पीछे हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की जानकारी का अभाव इसके लिए एक मुख्य कारण है। ऐसे में विज्ञान संबंधी जानकारियों का प्रसार आवश्यक हो जाता है। विज्ञान के प्रसार और विज्ञान लोकप्रियकरण के महत्व को देखते हुए भारत सरकार द्वारा 11 मई, 2022 को वैज्ञानिक सामाजिक उत्तरदायित्व दिशानिर्देर्शों को सार्वजनिक किया गया । इस दस्तावेज में विज्ञान संचार पर भी बल दिया गया है। हालांकि मीडिया और जनता में एक आम मान्यता हैं कि भारतीय वैज्ञानिक जन-मानस या मीडिया के साथ अपना शोध कार्य साझा करने में उतने उत्साहित नहीं रहते हैं।

यह आम धारणा है कि विज्ञान और समाज के बीच एक सार्थक संवाद स्थापित करने और विज्ञान संचार में अपना योगदान देने के प्रति वैज्ञानिकों की रुचि नहीं होती है। इन मान्यताओं के विपरीत, वरिष्ठ भारतीय वैज्ञानिकों की विज्ञान संचार के प्रति धारणाओं और मनोवृत्तियों का अध्ययन करने वाले एक सर्वे आधारित अध्ययन से पता चलता है कि अधिकतर वैज्ञानिक विज्ञान संचार के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं और विज्ञान संचार के महत्व को भालिभांति समझते हैं। अधिकांश भारतीय वैज्ञानिकों ने विज्ञान को जनता तक पहुंचाने के महत्व एवं विज्ञान और समाज के बीच संबंधों को मजबूत करने में विज्ञान संचार की प्रासंगिकता को मान्यता दी है। यह अपनी तरह का पहला सर्वे था जिसे संबंधित शोधपत्र ब्रिटेन की रॉयल मेट्रोलॉजिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका वेदर (Weather) में हाल ही में प्रकाशित हुया है। भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे के डॉ. अभय एसडी राजपूत और बिट्स- पिलानी (BITS-Pilani), पिलानी की प्रोफेसर संगीता शर्मा द्वारा इस शोधपत्र को लिखा गया है।

इस अध्ययन के अंतर्गत, भारत के वरिष्ठ और अनुभवी वैज्ञानिकों जो भारत की तीन प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों भारतीय विज्ञान अकादमी, बेंगलुरु; भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, नई दिल्ली; और राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारत (NASI),प्रयागराज के एलेक्टेड फेलो थे को ‘भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विज्ञान संचार’ पर एक ऑनलाइन क्रॉस-सेक्शनल सर्वे में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया।

इस सर्वे के परिणामों से पता चलता है कि इस अध्ययन में भाग लेनेवाले लगभग सभी शीर्ष भारतीय वैज्ञानिकों (~ 97%) ने यह माना कि आम जनता तक विज्ञान के संदेश को ले जाना या विज्ञान संचार करना एक आवश्यक गतिविधि है। इस अध्ययन में 78% शीर्ष भारतीय वैज्ञानिकों ने यह भी माना कि ‘करदाताओं के पैसे से किए जाने वाले शोध कार्य के बारे में जनता को सूचित करना’ वैज्ञानिकों का एक नैतिक कर्तव्य है।

इस शोध के प्रमुख लेखक डॉ राजपूत ने बताया कि “इस अध्ययन के ये निष्कर्ष उन मिथ्या धारणाओं सेअलग हैं जो ‘वैज्ञानिक जनता के साथ विज्ञान संचार को कोई महत्व नहीं देते’ जैसी मनगढ़ंत अवधारणाओं पर निर्मित थे। ऐसे निष्कर्ष जब शीर्ष वैज्ञानिक/प्रशासनिक पदों पर आसीन वरिष्ठ वैज्ञानिकों से आता हैं तो ये और भी अधिक मत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस शोध में भाग लेने वाले आधे से अधिक वैज्ञानिक विश्वविद्यालयों के कुलपति, शोध संस्थानों के निदेशक, विभागों के प्रमुख या समूह के नेता थे। ऐसे में इस शोध कार्य के परिणाम बहुत अहम हैं।

इस अध्ययन में यह भी पता चला कि सर्वे में हिस्सा लेने वाले अधिकांश भारतीय वैज्ञानिक (80-81%) इस बात से चिंतित थे कि जनता की वैज्ञानिक अज्ञानता संभावित रूप से लोगों को वैज्ञानिक परियोजनाओं का विरोध करने और विज्ञान की प्रगति में बाधा उत्पन्न करने कि ओर प्रेरित कर सकती है।संभवत: वैज्ञानिक अज्ञानता के इन नकारात्मक प्रभावों से अवगत होते हुये,अधिकांश वैज्ञानिकों (95-96%) ने विज्ञान के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने और बेहतर विज्ञान-समाज संबंध स्थापित करने का समर्थन किया है।

अध्ययन का एक और रोचक परिणाम यह है कि अधिकांश वैज्ञानिक (73%) भविष्य में विज्ञान संचार से संबंधित गतिविधियों में भाग लेने के लिए इच्छुक थे। यह जानकर बड़ी प्रसन्नता होती है कि अधिकांश भारतीय वैज्ञानिक न केवल विज्ञान संचार के महत्व से अवगत हैं, बल्कि ऐसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए इच्छुक भी हैं। शीर्ष वैज्ञानिकों की ऐसी उत्साहजनक मनोवृत्तियां निश्चित रूप से युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को विज्ञान संचार में अधिक योगदान देने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करेंगी।”

इस अध्ययन पर इस बात पर जोर दिया गया है “विज्ञान से संबन्धित संस्थाओं को उचित नीति और व्यावहारिक हस्तक्षेप से ऐसी उत्साहजनक पारिस्थितियों का निर्माण करना चाहिए जहां वैज्ञानिक स्वेच्छा से और सक्रिय रूप से विज्ञान संचार में योगदान दे सकें और जनता के साथ संवाद कर सकें। वैज्ञानिक संस्थानों में ऐसा वातावरण बने कि वैज्ञानिकों की सकारात्मक धारणाओं और दृष्टिकोणों तथा उनके विज्ञान संचार गतिविधियों में शामिल होने की इच्छा को वास्तव में क्रियान्वित किया जा सके।”

शीर्ष भारतीय वैज्ञानिकों की विज्ञान संचार के प्रति धारणाओं और मनोवृत्तियों के इस अध्ययन से जो निष्कर्ष मिले हैं वे वैज्ञानिकों के सामाजिक उत्तरदायित्व को निर्धारित करने के लिए नीति-निर्माण में संस्थागत और सरकारी संस्थाओं के लिए सहायक सिद्ध होंगे।

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