टाइप 1 और टाइप 2 डायबीटीज़ उपचार में उपयोगी अणुओं की खोज

नवनीत कुमार गुप्ता
आहार और दिनचर्या में बदलाव के कारण अनेक बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या में निरतंर वृद्धि हुयी है। अनेक
बीमारियां संतुलित आहार न लेने के कारण उत्पन्न हो रही हैं। वैसे जैसे-जैसे रोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है। उनके
ईलाज के तरीकों को भी खोजा जा रहा है। मधुमेह यानी डायबीटीज़ एक ऐसा गंभीर रोग है जिसके रोगियों को
काफी परेशानी उठानी होती है। इस बीमारी के उपचार के लिए अनेक शोध कार्य चल रहे हैं इस दिशा में भारतीय
प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ताओं ने डायबीटीज़ के इलाज में कारगर एक अणु यानी मोलेक्यूल का पता लगाया
है। पीके2 नामक यह मोलेक्यूल पैनक्रियाज़ से इंसुलिन का स्राव शुरू करने में सक्षम है और इससे डायबीटीज के
इलाज के लिए दवा की गोली बनाने की काफी उम्मीद है।

शोध के निष्कर्ष जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल कैमिस्ट्री में प्रकाशित किए गए हैं। शोधपत्र के लेखक डॉ. प्रोसेनजीत
मंडल, एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ बेसिक साइंसेज, आईआईटी मंडी से हैं और सहलेखक प्रोफेसर सुब्रत घोष,
स्कूल ऑफ बेसिक साइंसेज, आईआईटी मंडी, डॉ. सुनील कुमार, आईसीएआर-आईएएसआरआई, पूसा, नई दिल्ली,
डॉ बुधेश्वर देहुरी, आईसीएमआर आरएमआरसी, भुवनेश्वर, डॉ. ख्याति गिरधर, सुश्री शिल्पा ठाकुर, डॉ. अभिनव
चौबे, डॉ. पंकज गौर, सुश्री सुरभि डोगरा, सुश्री बिदिशा बिस्वास, आईआईटी मंडी और डॉ दुर्गेश कुमार द्विवेदी
(क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अनुसंधान संस्थान (आरएआरआई) ग्वालियर) से हैं।

शोध के बारे में बताते हुए डॉ. प्रोसेनजीत मंडल ने कहा, ‘‘डयबीटीज़ के इलाज के लिए वर्तमान में एक्सैनाटाइड और
लिराग्लूटाइड जैसी दवाओं की सुई दी जाती है और वे महंगी और अस्थिर होती हैं। हमारा लक्ष्य सरल दवाइयां ढूढना
है जो टाइप 1 और टाइप 2 दोनों तरह के डायबीटीज़ के उपचार के लिए स्थिर, सस्ती और असरदार हो।’’

डायबीटीज़ के मरीज में ब्लड ग्लूकोज लेवेल के अनुसार पैनक्रियाज़ के बीटा सेल्स से इंसुलिन का स्राव कम हो जाता
है। इंसुलिन के स्राव से कई जटिल जैव रासायनिक प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसी ही एक प्रक्रिया में जीएलपी1आर नामक
प्रोटीन संरचनाएं शामिल होती हैं जो कोशिकाओं में मौजूद होती हैं। खाने के बाद स्रावित जीएलपी1 नामक हार्माेनल
मोलेक्यूल जीएलपी1 से जुड़ता है और इंसुलिन का स्राव शुरू करता है। एक्सैनाटाइड और लिराग्लूटाइड जैसी दवाएं
जीएलपी1 को मिमिक करती हैं और जीएलपी1आर से जुड़ कर इंसुलिन का स्राव शुरू करती है।

इन दवाओं का विकल्प तैयार करने के लिए शोध करने वाली बहु-संस्थान टीम ने पहले कंप्यूटर सिमुलेशन से विभिन्न
छोटे मोलेक्यूल की स्क्रीनिंग की जो जीएलपी1आर से जुड़ सकते हैं। पीके2, पीके3, और पीके4 में जीएलपी1आर से
जुड़ने की अच्छी क्षमता पाई गइ्र। इसके बाद उन्होंने पीके2 को चुना क्योंकि यह सॉल्वैंट्स में बेहतर घुलता है।
आगामी परीक्षण के लिए शोधकर्ताओं ने लैब में पीके2 सिंथेसाइज़ किया।

शुरुआती शोध के बारे में बताते हुए डॉ. ख्याति गिरधर ने कहा, ‘‘हमने सबसे पहले मानव कोशिकाओं में मौजूद
जीएलपी 1 आर प्रोटीन पर पीके 2 के जुड़ने का परीक्षण किया और पाया कि यह जीएलपी 1 आर प्रोटीन से अच्छी
तरह जुड़ने में सक्षम है। इससे पता चला कि पीके2 में बीटा सेल्स से इंसुलिन के स्राव कराने की संभावना है।’’
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि पीके2 गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट में तेजी से अवशोषित हो गया जिसका अर्थ यह है कि
इससे तैयार दवा की सुई के बदले खाने की गोली इस्तेमाल की जा सकती है। इसके अतिरिक्त दवा देने के दो घंटे के
बाद, पीके2 चूहों के लीवर, किडनी और पैनक्रियाज़ में पहंुच गया पाया गया जबकि इसका कोई अंश हृदय, फेफड़े
और स्प्लीन में नहीं था। बहुत कम मात्रा में यह मस्तिष्क में मौजूद पाया गया जिससे पता चलता है कि यह मोलेक्यूल
रक्त-मस्तिष्क बाधा पार करने में सक्षम हो सकता है। लगभग 10 घंटे में यह रक्तसंचार से बाहर निकल गया।

डॉ. प्रोसेनजीत मोंडल ने शोध का एक अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष बताते हुए हैं, ‘‘पीके2 इंसुलिन का स्राव बढ़ाने से बढ़
कर बीटा सेल का नुकसान कम करने और यहां तक कि सुधार करने में भी सक्षम पाया गया। बीटा सेल इंसुलिन बनाने
के लिए आवश्यक है इसलिए पीके2 टाइप 1 और टाइप 2 दोनों तरह के डायबीटीज में प्रभावी होगा।’’

पीके2 के जैविक प्रभावों के परीक्षण के मकसद से शोधकर्ताओं ने प्रयोग में शामिल चूहों को मुंह से इसकी खुराक दी
और ग्लूकोज लेवेल और इंसुलिन के स्राव की माप की। कंट्रोल गु्रप की तुलना में पीकेे2 से इलाज किए गए चूहों में
सीरम इंसुलिन का स्तर छह गुना बढ़ गया। इस निष्कर्ष से डायबीटीज़ के मरीजों को सस्ती खाने की दवा मिलने की
उम्मीद जगी है।

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