दूरसंचार प्रौद्योगिकियों के लिए प्रौद्योगिकी विकसित

नवनीत कुमार गुप्ता

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मंडी के शोधकर्ताओं ने दूरसंचार प्रौद्योगिकियों के लिए अत्याधुनिक समाधान का विकास किया है। संस्थान में हाल में विकसित कॉपरेटिव स्पेक्ट्रम सेंसर वायरलेस संचार के भावी उपयोगों में डेटा संचार की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम के दुबारा उपयोग की क्षमता बढ़ाएगा। शोधकर्ताओं ने कॉपरेटिव स्पेक्ट्रम सेंसर (सीएसआर) का विकास किया है जो 5जी और 6जी वायरलेस संचार की भावी प्रौद्योगिकियों में स्पेक्ट्रल क्षमता बढ़ाएगा और देश के दूरदराज और गांव- देहात में ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू करने में भी मदद करेगा।

शोध कार्य के निष्कर्ष हाल ही में आईईईई ट्रांजेक्शन ऑन कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आईईईई जर्नल जैसे आईईईई ट्रांजेक्शन ऑन वेरी लार्ज स्केल इंटीग्रेशन (वीएलएसआई) सिस्टम्स और आईईईई ट्रांजेक्शन ऑन सर्किट्स एंड सिस्टम्स-। में प्रकाशित किए गए हैं। शोध पत्र के लेखक कंप्यूटिंग एवं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग स्कूल, आईआईटी मंडी के डॉ. राहुल श्रेष्ठ, सहायक प्रोफेसर और पीएच.डी. शोधार्थी श्री रोहित बी चैरसिया हैं।

रेडियो फ्रीक्वेंसी तरंगें या दूरसंचार क्षेत्र में प्रचलित ‘स्पेक्ट्रम’ कम ऊर्जा के विकिरण हैं जिनका उपयोग वायरलेस संचार में किया जाता है। वायरलेस रेडियोफ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम एक सीमित संसाधन है और सरकारें दूरसंचार कंपनियों को इसका आबंटन लाइसेंस के माध्यम से करती हैं। हाल के वर्षों में वायरलेस संचार प्रौद्योगिकी में तेजी से वृद्धि हुई है और आने वाले समय में पांचवें जेनरेशन के नए-रेडियो (5जी-एनआर) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) जैसी प्रौद्योगिकियों को व्यापक रूप से अपनाए जाने के कारण इसमें कई गुना वृद्धि का अनुमान है जिसके परिणामस्वरूप स्पेक्ट्रम बैंड की भारी मांग होने की उम्मीद है।

स्पेक्ट्रम के अनुकूल उपयोग में अनुसंधान की अहमियत बताते हुए डॉ. राहुल श्रेष्ठ, सहायक प्रोफेसर, आईआईटी मंडी ने कहा, “हमारी सरकार सहित पूरी दुनिया की कई सरकारों ने सुनिश्चित-स्पेक्ट्रम आबंटन की नीति अपनाई है जिसके मद्देनजर उपलब्ध स्पेक्ट्रम का बुद्धिमानी से उपयोग करना जरूरी है।” स्पेक्ट्रम के अनुकूल उपयोग के सबसे अच्छे तरीकों में एक कॉग्निटिव रेडियो टेक्नोलॉजी है।

दूरसंचार कंपनी (जिसे प्राइमरी यूजर या पीयू कहते हैं) लाइसेंस के तहत प्राप्त स्पेक्ट्रम बैंड के सभी हिस्सों का उपयोग हर समय नहीं करती है। कॉग्निटिव रेडियो टेक्नोलॉजी के पीछे यह सोच काम करती है कि सेल फोन जैसे वायरलेस डिवाइस जिसका उपयोग सेकेंडरी यूजर (एसयू) करते हैं उसमें एक विशेष सेंसर लगाया जा सकता है जो ऐसे ‘स्पेक्ट्रम होल’ (स्पेक्ट्रम पाट्र्स जो पीयू के उपयोग में नहीं हैं) डिटेक्ट कर सकता है और मुख्य चैनल अनुपलब्ध या फिर क्राउड होने पर उनका उपयोग कर सकता है। इससे परिवर्तनशील-स्पेक्ट्रम प्राप्त करने की नीति का आधार तैयार होगा जो किसी समय स्पेक्ट्रम की उपलब्धता की कमी दूर कर सकता है। एसयू के डिवाइस में लगे स्पेक्ट्रम-होल का पता लगाने वाले इस सेंसर को स्टैंड- अलोन स्पेक्ट्रम सेंसर (एसएसएसआर) कहते हैं।

टीम के शोध को समय की मांग बताते हुए डॉ राहुल श्रेष्ठ ने कहा, ‘‘एसएसएसआर में पहचान करने की क्षमता अक्सर संतोषजनक नहीं होती है जिसकी वजह हिडेन-नोड और सिग्नल-टू-न्वायज़ रेशियो (एसएनआर)-वॉल जैसी समस्याएं हैं। इसलिए जब रियल टाइम में एसएसएसआर का उपयोग किया जाता है तो कार्य प्रदर्शन में विश्वसनीयता नहीं होती है।”

टीम का शोध उपरोक्त समस्या दूर करने का अभूतपूर्व प्रयास है। यह शोध कार्य ऐसी तकनीक पर केंद्रित है जिसमें एसयू के वायरलेस डिवाइस में एसएसएसआर नहीं लगा है बल्कि स्पेक्ट्रम बैंड से प्राप्त पार्ट्स को डेटा-फ्यूजन सेंटर (डीएफसी) भेजा जाता है। इसके बाद डीएफसी इन पार्ट्स को डिजिटाइज़ करता है और फिर डिवाइस-लेवेल एसएसएसआर उपयोग करने के बजाय सिंगल कॉपरेटिव -स्पेक्ट्रम सेंसर (सीएसआर) से प्राॅसेस करता है। विश्वसनीय निर्णय अवसर पड़ने पर संचार के लिए सभी एसयू उपकरणों को प्रसारित किया जाता है।

अपने शोध के बारे में आईआईटी मंडी के रिसर्च स्कॉलर श्री रोहित बी. चैरसिया ने बताया, “हम ने कॉपरेटिव स्पेक्ट्रम सेंसिंग के लिए लागू करने में आसान एल्गोरिदम पेश किया है। इसमें कम्प्यूटेशन की जटिलता कम है और फिर सीएसआर और उनके सबमॉड्यूल्स के लिए कई नए हार्डवेयर-आर्किटेक्चर भी विकसित किए गए हैं।’’

आईआईटी मंडी द्वारा विकसित डिजिटल सीएसआर एएसआईसी-चिप वास्तविक चैनल परिदृश्यों में पीयू को उत्कृष्ट ‘डिटेक्शन’ की विश्वसनीयता के साथ हार्डवेयर की बेहतरीन क्षमता और कम से कम समय में सेंसिंग की क्षमता भी देगा। स्पेक्ट्रम जो उपयोग में नहीं होगा वह प्राप्त करने के लिए सीएसआर चिप का उपयोग किसी भी मोबाइल वायरलेस संचार उपकरण से किया जा सकता है। इसका खास कर आने वाले समय में 5जी और 6जी वायरलेस संचार प्रौद्योगिकियों में स्पेक्ट्रम की क्षमता बढ़ाने में बहुत लाभ होगा।

इसके अतिरिक्त यह आईओटी-आधारित नेटवर्क व्यापक रूप से लागू करने में सक्षम बनाएगा जिसमें कई कनेक्टेड डिवाइस बिना ब्रेक संचार के लिए स्पेक्ट्रम होल का उपयोग कर सकते हैं। भारत में कॉपरेटिव स्पेक्ट्रम-सेंसिंग टेक्नोलॅजी के उपयोग को कम नहीं आंका जा सकता है और यह देश के दूरदराज और गांव- देहात में ब्रॉडबैंड सेवाएं लागू करने में सहायक होगी।

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