स्वाधीनता आंदोलन में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान का उत्सव

नई दिल्ली, 03 अगस्त (इंडिया साइंस वायर): भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में राजनीतिक आंदोलनकारियों, क्रांतिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के योगदान की चर्चा खूब होती है। लेकिन, स्वाधीनता की चेतना जगाने और स्वतंत्र देश के भविष्य-निर्माण की आधारशिला रखने वाले वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा कम ही होती है। एक नयी पहल के अंतर्गत स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान का राष्ट्रव्यापी उत्सव मनाने के लिए एक विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया गया है।

भारत के महान रसायनज्ञ, उद्यमी तथा महान शिक्षक डॉ प्रफुल्लचन्द्र राय (02 अगस्त 1861 – 16 जून 1944) की 160वीं जयंती के अवसर पर, साल भर चलने वाले इन कार्यक्रमों की श्रृंखला की औपचारिक शुरुआत केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में सोमवार को की गई है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की स्वायत्त संस्था विज्ञान प्रसार, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से संबंद्ध संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन ऐंड पॉलिसी रिसर्च (सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर) और गैर-सरकारी संगठन विज्ञान भारती (विभा) ने मिलकर स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार किया है।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), डॉ जितेंद्र सिंह ने इस अवसर पर कहा कि “वैज्ञानिक योग्यता की तुलना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अधिक महत्वपूर्ण होता है।” उन्होंने यह भी कहा कि गाँधी जी की ‘अहिंसा’ और ‘सत्याग्रह’ और कुछ नहीं, बल्कि आक्रामकता के खिलाफ एक ‘मूक जैविक युद्ध’ था। ”केंद्रीय मंत्री ने कहा कि विज्ञान से जुड़े विषयों का बेहतर उपयोग करने के लिए जरूरी नहीं कि कोई छात्र या विज्ञान का विद्वान ही ऐसा कर सकता है।

बल्कि, ऐसा करने के लिए व्यक्ति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का होना अधिक महत्वपूर्ण है। डॉ जितेंद्र सिंह ने विज्ञान के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि विज्ञान के माध्यम से ही भारत विश्वगुरु बन सकता है। “हमें विज्ञान की सभी धाराओं में तालमेल बिठाने और अन्य हितधारकों की भागीदारी के साथ विषय आधारित अनुसंधान परियोजनाओं को शुरू करने की आवश्यकता है।”

उन्होंने कहा, “समकालीन समय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करें, तो मेरे हिसाब से आज हमारे आसपास वैज्ञानिक सोच का सबसे उल्लेखनीय उदाहरण कोई और नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।” सिंह ने एक घटनाक्रम का हवाला दिया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू-कश्मीर के कटरा रेलवे स्टेशन उद्घाटन के मौके पर खिली हुई धूप को देखकर वहाँ सौर संयंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

डॉ सिंह ने कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और विज्ञान’ शीर्षक वाला यह उत्सव स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ का हिस्सा है। उत्सव को दो चरणों में मनाया जा रहा है। पहला चरण 15 अगस्त 2021 तक पूरा हो रहा है। जबकि, उत्सव का दूसरा चरण उसके बाद शुरू होगा, और अगले स्वतंत्रता दिवस तक चलेगा।

‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और विज्ञान’ पर केंद्रित इस उत्सव के प्रथम चरण में कक्षा VI से XI तक के स्कूली छात्रों के लिए विद्यार्थी विज्ञान मंथन के वेब पोर्टल (www.vvm.org.in) पर विज्ञान प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का शुभारंभ किया गया; और स्वतंत्रता-पूर्व अवधि के दौरान काम करने वाले भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा लोगों में स्वदेशी और राष्ट्रवाद की भावना जागृत करने में उनके योगदान पर पोस्टर तैयार किए गए।

उत्सव के दूसरे चरण में, अतीत के स्वदेशी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की विरासत का चित्रण करने वाली फिल्मों एवं वृत्तचित्रों पर आधारित ‘स्वतंत्रता का विज्ञान फिल्मोत्सव’ कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके अंतर्गत भारतीय वैज्ञानिकों के प्रति अंग्रेजों के दमन एवं उपेक्षात्मक नीतियों को फिल्मों के माध्यम से प्रदर्शित करने की कोशिश है।
फिल्मों के माध्यम से यह रेखांकित करने का प्रयास रहेगा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने औपनिवेशिक विज्ञान के प्रति कैसे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

दूसरे चरण के कार्यक्रमों में विज्ञान संचारकों के लिए राष्ट्रीय सम्मेलन और स्कूली तथा उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के लिए राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन शामिल है। पूरे साल चलने वाले इस उत्सव के औपचारिक ऑनलाइन उद्घाटन समारोह में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबले ने स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान को प्रदर्शित करने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा, “भारत जब अपनी आजादी के लिए
लड़ रहा था, तो उस दौर के कई वैज्ञानिक सिर्फ प्रयोगशालाओं तक ही सीमित नहीं थे।

देश और दुनिया में बाहर क्या हो रहा है, इस बात से वे भली-भांति वाकिफ थे। उनके योगदान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। यह अच्छा है कि उनके योगदान को उजागर किया जा रहा है। “श्री होसबले, जो कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, ने इस बात पर भी जोर दिया कि विज्ञान को केवल वैज्ञानिकों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि यह जीवन के हर पहलू से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक दिग्गजों ने भी भारतीय विज्ञान में बहुत बड़ा योगदान दिया है।

उन्होंने स्मरण दिलाया कि स्वामी विवेकानंद ने बेंगलुरु में भारतीय विज्ञान संस्थान की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। विभा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री जयंत सहस्रबुद्धे, विभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विजय भटकर और विज्ञान प्रसार के निदेशक डॉ. नकुल पाराशर ने आशा व्यक्त की कि वर्ष भर चलने वाले समारोह युवा पीढ़ी को नयी प्रेरणा देंगे और भारत को नयी ऊंचाइयों को प्राप्त करने में मदद करेंगे।

सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की निदेशक और इस कार्यक्रम की संयोजक प्रोफेसर रंजना अग्रवाल ने समारोह में शामिल कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी प्रदान की। कार्यक्रम में, भारतीय स्वतंत्रता के समय और उसके बाद सक्रिय महिला वैज्ञानिकों एवं उद्यमियों पर केंद्रित पुस्तिका `विज्ञान विदुषी’ का विमोचन किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन में वैज्ञानिकों के योगदान पर केंद्रित व्याख्यान श्रृंखला के वक्तव्यों को आलेख के रूप में संकलित कर पुस्तक का रूप
दिया गया है।

‘स्वतंत्रता संग्राम ऐंड विज्ञान’ नामक इस पुस्तक का विमोचन भी इस मौके पर किया गया। विज्ञान प्रसार द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका ड्रीम-2047 के भारतीय स्वतंत्रता के 75वें वर्ष पर केंद्रित विशेष संस्करण के साथ-साथ इस संस्थान द्वारा प्रकाशित छह भारतीय भाषाओं में न्यूजलेटर्स के विशेषांकों का विमोचन भी किया गया है।

इसके अलावा, साल भर चलने वाले समारोहों के सभी पहलुओं पर विवरण प्रदान करने के लिए www.swavigyan75.in नामक एक वेब पोर्टल लॉन्च किया गया है। इस ऑनलाइन समारोह में, आचार्य सर प्रफुल्ल चंद्र राय की 160वीं जयंती मनायी गई और उनके योगदान को भी याद किया गया।

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