अमेरिकी वैज्ञानिकों ने किया दावा कहा, रेड मीट बढ़ाता है कैंसर का खतरा

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने हाल ही में अपनी एक रिसर्च में दावा किया है की रेड मीट इंसान का DNA डैमेज करके कोलोन कैंसर का रिस्क बढ़ाता है। वैसे तो डॉक्टर्स भी लोगो को कम से कम रेड मीट खाने की सलाह देते है। उनके मुताबिक, रेड मीट को अपने खानपान मे शामिल करने से कोलोन कैंसर का खतरा बढ़ाता है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने अपनी हालिया रिसर्च में दावा किया की, यह एक कार्सिनोजेनिक फूड है यानी ऐसा खानपान जो कैंसर की वजह बन सकता है।

वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के मुताबिक, रेड मीट का सेवन करने वालो के DNA में ऐसा बदलाव दिखा जो पहले कभी नहीं देखा गया था। यह बदलाव साबित करता है कि DNA डैमेज हुआ है। शरीर की सभी कोशिकाओं में यह बदलाव नहीं हुआ लेकिन कोलोन से लिए गए सैम्पल में इसे देखा गया। शोधकर्ता और डाना-फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट के एक्सपर्ट मारियोज गियानेकिस कहते हैं, हमने टीम के साथ मिलकर कोलोन कैंसर से जूझने वाले 900 मरीजों पर रिसर्च की और फिर इनके DNA की जांच की।

वैज्ञानिकों का कहना है, रेड मीट में नाइट्रेट जैसे केमिकल पाए जाते हैं, जो कैंसर की वजह बन सकते हैं। इससे पहले भी रिसर्च में साबित हो चुका है कि स्मोकिंग की आदत और अल्ट्रावायलेट किरणें इंसान के जीन पर बुरा असर डालती हैं। नतीजा, कैंसर का खतरा बढ़ता है। कोशिकाएं कंट्रोल से बाहर होने लगती हैं और अपनी संख्या को बढ़ाती हैं।

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर को रोकने का सबसे अच्छा तरीका रेग्युलर स्क्रीनिंग है। स्क्रीनिंग प्रक्रिया के तहत लोगों में कैंसर की जानकारी का पता तब भी लगाया जा सकता है कि जब उन्हें लक्षण नजर नहीं आ रहे हों। आमतौर पर स्क्रीनिंग शुरू में कोलोरेक्टल कैंसर का पता लगा सकती है। एक पॉलिप को कैंसर बनने के लिए 10 से 15 साल का वक्त लगता है। स्क्रीनिंग के जरिए डॉक्टर पॉलिप्स को कैंसर में बदलने और बढ़ने से पहले उनका पता कर शरीर से निकाल सकते हैं।

कोलोन कैंसर और उसके लक्षण

कोलोरेक्टल कैंसर (colorectal cancer) को बड़ी आंत का कैंसर भी कहते हैं। ये कैंसर बड़ी आंत (कोलोन) या रेक्टम (गैस्ट्रो इंटस्टाइनल का अंतिम भाग) में होता है। इस कैंसर में पेट से जुड़ी कई प्रॉब्लम्स जैसे इरिटेबल बाउल सिंड्रोम और कब्ज की समस्या होती है। अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Centers for Disease Control and Prevention) के मुताबिक, यह कैंसर महिलाओं और पुरुषों दोनों को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह 50 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों में पाया जाता है।

कैंसर इंडिया के मुताबिक, ये लक्षण दिखने पर  हो जाएं अलर्ट-

मल में या मल के ऊपर खून के काले धब्बे होना।
पेट में ऐंठन, सूजन, गैस या दर्द का बने रहना।
बिना वजह थकान, कमजोरी, भूख में कमी या वजन कम होना।
पेल्विक एरिया में दर्द होना। यह दर्द बीमारी की बाद की स्टेज में होता है।
लगातार कब्ज या दस्त बने रहना, पेट पूरी तरह से साफ नहीं होने का अहसास या मल का आकार बदलना समेत बाउल हैबिट्स में बदलाव आना।

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