सालो पुरानी बीमारी प्लेग की बनी वैक्सीन, कोरोना वैक्सीन के आधार पर तैयार हुआ प्लेग का टीका

ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप के वैज्ञानिकों ने हजारों साल पुरानी बीमारी प्लेग की वैक्सीन बनाई। प्लेग की वैक्सीन को कोरोना वैक्सीन के मॉडल के आधार पर विकसित किया गया है। ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप का कहना है, प्लेग होने की वजह है, येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया का संक्रमण। इस बीमारी का वाहक है चूहा। बैक्टीरिया से संक्रमित चूहे के काटने पर संक्रमण फैलता है।

बता दें प्लेग के तीन स्टेज होते है। पहली ब्यूबॉनिक प्लेग, यह बीमारी की शुरुआती स्टेज है। संक्रमण के बाद बुखार, सिरदर्द, कंपकंपी, थकान और लिम्फ नोड में सूजन जैसे लक्षण दिखते हैं। इलाज न होने पर बैक्टीरिया धीरे-धीरे अपनी संख्या बढ़ाकर शरीर के अलग-अलग हिस्सों में फैलना शुरू कर देता है।

दूसरी सेप्टीसीमिक प्लेग, इसमें संक्रमण का असर स्किन पर भी दिखता है। प्लेग के आम लक्षणों के अलावा मरीज की स्किन काली पड़ जाती है। खासतौर पर हाथ-पैर उंगलियों और नाक पर कालापन दिखता है। ब्यूबॉनिक प्लेग का इलाज न होने पर ये सेप्टीसीमिक प्लेग में तब्दील हो जाता है। तीसरी और आखिरी न्यूमोनिक प्लेग, यह सबसे गंभीर प्लेग है।

ब्यूबॉनिक और सेप्टीसीमिक प्लेग का इलाज न होने पर जब बैक्टीरिया फेफड़ों तक पहुंचा जाता है तो न्यूमोनिक प्लेग की स्थिति बनती है। प्लेग का यह रूप एक से दूसरे इंसान में जल्दी फैलता है। ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप के डायरेक्टर, सर एंड्रयू पोलार्ड का कहना है, महामारी ने लोगों को वैक्सीन का महत्व समझाया है और बताया है कि बैक्टीरिया-वायरस के खतरों से बचना कितना जरूरी है।

हजारों सालों से इंसान प्लेग से जूझते आए हैं और आज भी इसका खौफ जारी है। इसलिए इससे बचाने के लिए वैक्सीन बेहद जरूरी है। प्लेग की वैक्सीन इसलिए जरूरी है क्योंकि आज भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। प्लेग के सबसे ज्यादा मामले अफ्रीका, एशिया और अमेरिका के ग्रामीण इलाकों में देखे जाते हैं। कोरोना वैक्सीन के मॉडल पर तैयार हुई इस वैक्सीन के पहले फेज का ट्रायल जल्द शुरू होगा।

इसमें 18 से 55 साल की उम्र के 40 लोगों को शामिल किया जाएगा। ट्रायल के दौरान वैक्सीन के साइड इफेक्ट और बीमारी से लड़ने के लिए बनने वाली एंटीबॉडी कितनी असरदार है, इसे समझा जाएगा। ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप का कहना है, प्लेग का संक्रमण होने पर तेज बुखार, लिम्फ नोड में सूजन, सांस लेने में तकलीफ होती है। कुछ मामलों में खांसी के दौरान मुंह से खून आने के शिकायत भी होती है। इलाज न होने पर मौत हो जाती है।

संक्रमित चूहे के काटने के अलावा, संक्रमित जानवर के आसपास रहना या फिर इन्हें उठाने पर संक्रमण फैल सकता है। संक्रमित इंसान के लार के सम्पर्क में आने पर दूसरे स्वस्थ इंसान में भी इसका संक्रमण फैल सकता है।
हालांकि एंटीबायोटिक्स की मदद से इसका इलाज किया जा सकता है,

लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज की पर्याप्त सुविधाएं आसानी से उपलबध न होने के कारण मामले बढ़ते हैं। गौरतलब हो की अफ्रीका, एशिया और अमेरिका के गांव समेत दुनियाभर में 2010 से 2015 के बीच प्लेग के 3,248 मामले सामने आए। वहीं, प्लेग से 548 मौतें हुईं।

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