गणेश चतुर्थी स्पेशल: क्या आप जानते है एक मूषक कैसे बना श्री गणेश की सवारी?? अगर नही तो जरूर पढ़ें ये पौराणिक कथा

भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता माना जाता है तथा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का अवतरण हुआ था. इसलिए भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है. पूरे भारत में गणेश चतुर्थी से लेकर अगले दस दिनों तक जमकर उत्साह देखा जाता है।

इस साल गणेश चतुर्थी सेलिब्रेशन 10 सितंबर से शुरू हो चुका है. 11 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का समापन 21 सितंबर को होगा. ऐसे में क्या आपके मन में भी गणेशजी को देखकर ये सवाल आता है कि आखिर क्यों गणेश जी ने मूषक को अपना वाहन चुना होगा. अगर हां तो आज हम आपको बताएंगे इसका करना पढ़िए ये पौराणिक कथा.

तो इस तरह मूषक बना श्री गणेश का वाहन…

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि आश्रम बनाकर तप करते थें. उनकी पत्नी पतिव्रता होने के साथ- साथ रूपवती भी थीं. उनके मनमोहक रूप पर यक्ष और गंधर्व सब मोहित थे. एक बार सभी यक्ष और गर्धर्वों ने ऋषि पत्नी मनोमयी का हरण करने का निर्णय लिया. लेकिन मनोमयी पतीव्रता होने के साथ सौभरि ऋषि के कारण साहस नहीं कर पाते थे.

लेकिन उसमें से एक दुष्ट गर्धव क्रौंच खुद को रोक नहीं पाया और मनोमयी का हरण करने के लिए पहुंच गया. उसी समय सौभरि ऋषि आ गए और उन्होंने क्रौंच को श्राप दिया कि जिस तरह तुम एक चोर की तरह मेरी पत्नी का हरण कर रहे थे. उसी प्रकार तुम मूषक बना जाओगे और धरती पर छुपकर रहना पड़ेगा और पेट भरने के लिए चोरी करनी पड़ेगी. क्रौंच ऋषि से अपने कृत्य के लिए माफी मांगने लगा.

क्रौंच ने ऋषि से कहा कि आप दयालु है मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी इसलिए मैंने ऐसा अपराध किया. उस समय ऋषि ने कहा मेरा श्राप तो व्यर्थ नहीं जाएगा. लेकिन तुम्हें द्वापर युग में महार्षि पराशर के यहां गणपति मिलेंगे और तुम्हें अपना वाहन बना लेंगे. इससे देवता भी तुम्हारा सम्मान करेंगे. क्रौंच भले ही मूषक बन गया. लेकिन उसने अपने अंदर कोई सुधार नहीं किया.

वो अपने ताकत की घमंड में इतना चूर था कि अपने रास्ते में आने वाली सभी वस्तुओं को तोड़ता आगे चला गया. एक बार वह महार्षि पराशर के आश्रम में पहुंच गया और वहां पर रखी सभी चीजों को नष्ट कर दिया. उसने रखी ग्रंथों और किताबों को कुतर दिया. महार्षि पराशर ने मूषक की करतूत गणेश जी को बताया और उन्होंने मूषक को सबक सिखाने के लिए पाश फेंका. पाश मूषक का पीछा करते हुए पाताल लोक पहुंच गया और गले में लटक गया.

पाश से घसिटता हुआ मूषक गणेश जी के पास पहुंचा. लेकिन तब तक वह बेहोश हो चुका था. कुछ समय बाद जब उसे होश आया तो उसने बिना समय गवाएं गणेशजी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगेन लगा.
गणेश जी मूषक से प्रसन्न हुए और उन्होंने कुछ वरदान मांगने को कहा. उन्होंने कहा कि तुमने लोगों को बहुत कष्ट दिया है और तुम मेरे शराणार्थी हो इसलिए तुम्हें मैं माफ करता हूं.

गणेशजी से प्राणदान मिलते ही क्रौंच में अहंकार आ गया और उसने कहा मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए. अगर आपकी कोई इच्छ है तो पूरी कर देता हूं. गणेश जी मुस्कुराए और बोले अगर तुम्हारा वचन सत्य है तो तुम मेरे वाहन बन जाओ. मूषक ने झट से तथास्तु कह दिया. इसके बाद गणेश जी उस पर सवार हो गए.

उनके शरीर के भार से मूषक के प्राण संकट में आ गए. क्रौंच ने भगवान गणेश से अपना भार कम करने की विनती करने लगा. तब गणेश जी ने उसका गिड़गिड़ाना स्वीकार कर लिया. तब क्रौंच ने गणेश जी से वरदान मांगा कि वह उनका त्याग कभी न करें. गणेश जी के सवार होते ही उसकी बुद्धि खुल जाती है और उसका अहंकार भी टूट जाता है.

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